साहित्य, नाटक, सिनेमा की हर विधा के फ़नकार गिरीश कनार्ड, जिन्हें भुलाना संभव नहीं

Girish Karnad: एक्टिंग, निर्देशन, राइटिंग के अलावा गिरीश कनार्ड नाटककार, लेखक और एक बहुत मंझे हुए अभिनेता भी थे।

मनोरंजन साहित्य
Girish Kannard, a fan of every genre of literature, drama, cinema, which is not possible to forget

अगर आप आज की पीढ़ी के हैं और आपने सलमान खान की ‘एक था टाइगर’ (Ek Tha Tiger)और ‘टाइगर ज़िंदा है’ (Tiger Zinda Hai) देखी है तो आपको उस फिल्म का एक किरदार डॉक्टर शेनॉय ज़रूर याद होगा। गिरीश कनार्ड (Girish Karnad) की ये आखिरी फिल्म थी।  आपको शायद पता हो कि एक्टिंग, निर्देशन, राइटिंग के अलावा गिरीश कनार्ड नाटककार, लेखक और एक बहुत मंझे हुए अभिनेता भी थे। अपने पचास साल के करियर में गिरीश कनार्ड को सैंकड़ों पुरस्कारों से नवाजा गया।

इन्हें चार बार फिल्मफेयर अवॉर्ड, पद्मश्री, पद्मभूषण और ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला। साहित्य हो, सिनेमा हो या नाटक, जहां भी गिरीश कनार्ड होते थे, उनके होने का प्रभाव साफ़ दिखता था।

महाराष्ट्र के माथरेन में 19 मई, 1938 को जन्मे गिरीश कनार्ड बॉलीवुड और साउथ इंडियन सिनेमा के जाने-माने नाम थे।  हिंदी के अलावा उनकी कन्नड़ पर भी कमाल की पकड़ थी। कन्नड़ भाषा में उन्होंने कई नाटक भी लिखे। गिरीश कनार्ड की शख्सियत की विराटता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कन्नड साहित्य हो, कला जगत हो या समकालीन भारतीय कला और नाट्य परंपरा, उनके बिना ये सब अधूरे से लगते हैं।

कनार्ड आजाद भारत के श्रेष्ठतम नाट्यकारों की सूची में शामिल हैं। 1961 में उनके पहले नाटक ययाति ने नाट्य जगत में हलचल मचा दी थी। 1964 में उनके द्वारा लिखा तुग़लक और 1971 में लिखा गया हयवदन अंतराष्ट्रीय मंच पर  ख्याति फैला गया था। रंगमंच के अलावा मालगुड़ी डेज़ जैसे टीवी धारावाहिकों में कनार्ड ने जोरदार काम किया।

1971 में उन्होंने कन्नड फिल्म संस्कार से अभिनय की शुरुआत की थी, जो टाइगर ज़िंदा है तक जारी रही। गिरीश कनार्ड ने व्यावसायिक और आर्ट दोनों तरह की फिल्मों में काम किया।

मंथन, स्वामी, निशांत जैसी समांतर धारा की हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों में उनके सशक्त अभिनय की आज भी तारीफ की जाती है। दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाली विज्ञान पत्रिका टर्निंग प्वॉइंट के होस्ट के रूप में वे घर-घर में लोकप्रिय हो गए।

उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जाता है कि  उन्हें 10 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त हुए। 1974 में उन्हें पद्मश्री और 1992 में पद्मभूषण सम्मान मिला. 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और 1998 में भारतीय साहित्य के सर्वोच्च ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी उन्हें सम्मानित किया गया। कन्नड़ भाषा में उनके लिखे नाटकों का देश-विदेश की कई भाषाओं में अनुवाद किया गया।

रचनात्मकता की अपार ऊर्जा से भरे गिरीश कर्नाड एक सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। उनकी गहरी और भारी आवाज़ आज भी उनके चाहने वालों के कानों में गुंजायमान होती है।  गिरीश कनार्ड लोकप्रियता के शिखर पर होने के बावजूद  विनम्र थे। 10 जून, 2019 को 81 साल की उम्र में यह सितारा दुनिया को अलविदा कह गया।

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