हजारों करोड़ का कोष, फिर भी दुर्दशा का शिकार है ईएसआई अस्पताल

शहर के विभिन्न ईएसआई अस्पतालों और डिस्पेंसरियों की हालत बद से बदतर होती जा रही है।

Faridabad

Faridabad: ईएसआईसी के कोष में मजदूरों के खून पसीने की कमाई के करीब 70 हजार करोड़ रुपए पड़े हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद प्रदेश भर के ज्यादातर ईएसआई अस्पताल और डिस्पेंसरियां दुर्दशा का शिकार है। प्रदेश में ईएसआई के करीब 30 लाख आईपी (इंश्योर्ड पर्सन) हैं। नियमों के मुताबिक सरकार की तरफ से प्रत्येक आईपी के लिए तीन हजार रुपए सलाना दिया जाता है। जो करीब 900 करोड़ रुपए बनता है, लेकिन एक्ट में मौजूद खामियों के कारण इसमें से बड़ी मुश्किल से करीब 140 करोड़ रुपए सालाना खर्च हो पाते हैं। एक्ट में ईएसआई अस्पताल और डिस्पेंसरियों के प्रभारी डाक्टरों के पास खर्च करने की पावर नाम मात्र की है। जिसकी वजह से प्रदेश के लाखों मजदूरों को पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पा रही है। यहां तक ईएसआई के डाक्टरों को जर्जर आवास में जान जोखिम में डालकर रहना पड़ रहा है। ईएसआईसी की नीतियों से परेशान होकर हरियाण ईएसआई डाक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ अखिल महाजन लगातार पत्राचार करने के साथ साथ श्रम मंत्री से मुलाकात भी कर चुके हैं।

जर्जर अस्पताल और डिस्पेंसरी

जिले में ज्यादातर ईएसआई अस्पतालों और डिस्पेंसरियों की हालत इन दिनों बुरी तरह जर्जर हैं। सेक्टर सात स्थित डिस्पेंसरी की बिल्डिंग की जर्जर हालत को देखते हुए उसे खाली करवा कर ईएसआईसी ने टेक ओवर कर लिया था, लेकिन पिछले करीब दो सालों में यहां एक ईंट तक नहीं लगाई गई। इसी तरह सेक्टर 19, 27 और अन्य कई डिस्पेंसरियों के भवन जर्जर हो चुके हैं। सेक्टर आठ ईएसआई अस्पताल की हालत तो बद से बदतर हो चुकी है। इस इमारत के पुर्ननिर्माण के लिए एस्टीमेट भी बनाया जा चुका था, लेकिन ईएसआईसी के अधिकारियों ने एस्टीमेट पर आपत्ति लगा दी। जिसके कारण इस अस्पताल का काम आज तक अधर में लटका हुआ है। सेक्टर आठ अस्पताल परिसर में बने डाक्टर और स्टॉफ के आवास भी मरम्मत के अभाव में बुरी तरह जर्जर हो चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें मजबूरी में इन्हीं क्वार्टरों में परिवार के साथ रहना पड़ रहा है। मामले की शिकायत करने के बावजूद इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

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ठेके वापस लिए

भवनों की छोटी मोटी मरम्मत, बिजली रिपेयरिंग, साफ सफाई और अन्य कई तरह के कार्य ईएसआई द्वारा ठेके के कर्मचारियों से करवाए जाते थे, लेकिन ईएसआईसी ने इन ठेकों पर पाबंदी लगा दी है। जिससे अस्पताल में आने वाले मरीजों को तो दिक्कत हो ही रही है। यहां काम करने वाले डाक्टरों और कर्मचारियों को भी कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। अस्पताल के डाक्टर अथवा प्रभारी इस तरह के कामों को करवाने के बाद जब सेक्टर 16 स्थित ईएसआईसी के कार्यालय में बिल भेजते हैं तो वहां तैनात अधिकारियों द्वारा अपनी मनमानी करते हुए इन बिलों पर आपत्ति लगाकर रोक दिया जाता है। जिससे काम कराने वाले डाक्टरों पर दोहरी मार पड़ रही है। ईएसआईसी की तरफ से पहले अस्पतालों को 50 हजार रुपये मासिक इम्पे्रस्ट मनी दी जाती थी। करीब दो साल से ईएसआईसी ने यह पैसा देना भी बंद कर दिया था। कभी मशक्कत के बाद पैसा देना तो शुरू कर दिया, लेकिन इसमें भी आनाकानी की जाती है।

खर्च की पावर नहीं

ईएसआईसी एक्ट वर्ष 1948 में बना था। करीब 74 साल का समय गुजर जाने के बाद भी एक्ट में सुधार करने का कोई प्रयास नहीं किया गया। एक्ट में मौजूद खामियों की वजह से डाक्टरों के पास खर्च करने की पावर नाम मात्र की है। इसी वजह से सालाना मिलने वाले 900 करोड़ रुपए में से मात्र 140 करोड़ रुपए ही खर्च हो पाते हैं। वहीं दूसरी तरफ ईएसआईसी कोष में पैसा व्यर्थ में पड़ा है। आरोप है कि ईएसआईसी ने 30 हजार करोड़ रुपए से ईएसआई मेडिकल कॉलेजों का निर्माण कराया था। जोकि एक्ट में ही नहीं हैं। इस तरह की समस्याओं को लेकर हरियाणा ईएसआई डाक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष डाक्टर अखिल महाजन पिछले करीब पांच साल से पत्राचार कर रहे हैं। इस दौरान वे केंद्रीय श्रममंत्री, केंद्रीय श्रम सचिव और ईएसआईसी के महानिदेशक से भी मिल चुके हैं। केंद्रीय श्रममंत्री ने डॉ. महाजन से पूरी स्थिति को समझने के बाद ईएसआईसी के अधिकारियों को बिल पास न करने पर बर्खास्त तक करने की चेतवनी दी थी, लेकिन उन्होंने मंत्री के आदेशों को भी ताक पर रख दिया। ऐसे में शहर के विभिन्न ईएसआई अस्पतालों और डिस्पेंसरियों की हालत बद से बदतर होती जा रही है।

नहीं सुनते अधिकारी

हरियाणा डाक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. अखिल महाजन का कहना है कि पिछले पांच सालों से वे शिकायतें करके परेशान हो चुके हैं। ईएसआईसी के अधिकारियों की मनमानी से मजदूर परिवारों के साथ डाक्टर और कर्मचारियों को भी भारी परेशानी हो रही है। अब सिर से पानी ऊपर उठने के कारण उन्होंने प्रदेश के मजदूरों और डाक्टरों के हितों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट की शरण लेने का फैसला लिया है। उन्हें अदालत से न्याय मिलने की पूरी उम्मीद है।

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