कहीं आपने भी तो नहीं भुला दिया अपना ‘मी टाइम’?

एक मशहूर गीत की पंक्तियां हैं कि – किसी की याद में दुनिया को हैं भुलाए हुए ज़माना गुज़रा है अपना ख़याल आए हुए बाकियों का तो पता नहीं, लेकिन मेरी एक दोस्त को हाल ही में अपने आप को भुलाने की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। वह कीमत क्या थी, यह पूरी बात समझने […]

सेहत

एक मशहूर गीत की पंक्तियां हैं कि –

किसी की याद में दुनिया को हैं भुलाए हुए

ज़माना गुज़रा है अपना ख़याल आए हुए

बाकियों का तो पता नहीं, लेकिन मेरी एक दोस्त को हाल ही में अपने आप को भुलाने की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। वह कीमत क्या थी, यह पूरी बात समझने के लिए तो आपको यह पूरा वीडियो देखना पड़ेगा, क्योंकि जो कुछ मेरी फ्रेंड के साथ हुआ, वह सिर्फ़ उसी एक की नहीं, बल्कि हममें से बहुत से लोगों की कहानी है।

मेरी ये दोस्त अचानक काफ़ी बीमार रहने लगी। बार-बार उसकी तबियत ख़राब हो जाती और टैस्ट वग़ैरह करवाने पर कोई बड़ी बात न निकलती। सो यह समझ पाना बड़ा मुश्किल था कि उसकी बीमारी की असल वजह आख़िर है क्या। लगातार उदास रहना, बार-बार बुखार होना, कमज़ोरी और थकान तो जैसे रोज़ की बात बन गई थी। नींद जैसे पूरी ही नहीं होती थी कि सो कर उठने पर भी लगता कि पता नहीं कितना थकी हुई है। फिर आख़िरकार उसे एक डॉक्टर ने कहा कि उसकी बीमारी का नाम है, मी टाइम का ख़त्म हो जाना।

जी हां, मी टाइम (Me Time), यानी वह वक़्त जो सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारा होता है। देखने-सुनने में यह बात बहुत ही साधारण सी लगती है, लेकिन असल में है बहुत गहरी। हालांकि आज के ज़माने में ऐसे कम ही लोग मिलते हैं, जो दूसरों के सुख-दुख या ख़ुशियों को अपने से ज़्यादा अहमियत दें, लेकिन हमारे परिवारों की ज़्यादातर महिलाएं आज भी ऐसी ही होती हैं, जो अपनों की देखरेख में अपने को भुला देती हैं। सबके खान-पान का ध्यान रखना, आराम का ख़याल रखना, ख़ुशियों का ख़याल रखना और इसी के इर्द-गिर्द अपनी ज़िंदगी बिता देना। अगर आप ख़ुद एक महिला हैं तो इस बात को आसानी से समझ सकती हैं और अगर नहीं तो अपने आस-पास या अपने घर में ही नज़र दौड़ाइए, महिलाएं आज भी हर परिवार की धुरी हैं।

क्या है मी टाइम

वक़्त चाहे कोई भी हो, दिन के कुछ ऐसे पल जो सिर्फ़ आप अपने लिए, अपने साथ बिताएं, यही है आपका मी टाइम। दिन के चौबीस घंटों में से कुछ ऐसे पल, जो हम सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने साथ बिता सकें। चाहे उन पलों में हम अपने लिए कुछ ख़ास करना चाहें या फिर कुछ भी न करना चाहें। इस वक़्त की हमारी ज़िंदगी में अपनी ही अहमियत है, जिसे वक़्त के साथ दुनिया ने भी स्वीकारा है और साइंस ने भी। मी टाइम के दौरान ज़रूरी है कि कुछ देर के लिए ही सही, आप थोड़ा सा स्वार्थी होकर सिर्फ़ अपने बारे में सोचें, क्योंकि आजकल यह चलन थोड़ा कम ही हो गया है कि हमारे बारे में कोई और ही सोचे। फिर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अगर हम ख़ुद अपना ख़याल ही ठीक से नहीं रख सकते, अपने बारे में ही नहीं सोच सकते तो दूसरा कोई इस बात की परवाह क्यों करेगा।

क्यों अहम है मी टाइम

अब हम ये तो जानते ही हैं कि संतुलित डाइट, रेग्युलर एक्सरसाइज़, प्रॉपर्र नींद और ज़ेहनी शांति हम सभी के लिए कितनी ज़रूरी है, लेकिन महिलाएं आज भी अपने मामले में इन बातों की उपेक्षा करती आसानी से मिल जाएंगी। भले ही वे अपने परिवार के दूसरे लोगों के लिए इन्हीं चीज़ों को ज़रूरी मानती हों। घर में कोई भी सदस्य इस बातों की उपेक्षा करे या फिर थोड़ा परेशान हो, उनकी परेशानी में परिवार की महिलाएं सबसे पहले प्रभावित होती हैं, लेकिन जब बात अपनी परेशानी या बीमारी की आए  तो उसे बड़ी आसानी से नज़रअंदाज़ कर देती हैं और यही छोटी सी उपेक्षा कब एक बड़े अवसाद में बदल जाती है और अवसाद धीरे-धीरे कब छोटी-छोटी स्वास्थ्य समस्याओं से होते हुए एक बड़े रोग में तब्दील हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता।

क्या करें मी टाइम के लिए

इसके लिए आप अपनी सुविधा से दिन का कोई भी ऐसा समय चुन लीजिए, जिसे आप अपने-आप को दे सकें, चाहे यह बिल्कुल सुबह का वक़्त हो, दिन का वक़्त हो या फिर शाम का, इसे आप अपनी सुविधा से चुन लीजिए। इस वक़्त का उपयोग आप वह काम करने में कीजिए, जो आपका मन चाहता है। याद रखिए, यह काम सिर्फ़ आपसे जुड़ा होना चाहिए और किसी भी दूसरे से जुड़ा नहीं। इस वक़्त में आप थोड़ा व्यायाम कर सकती हैं, आराम कर सकती हैं, संगीत सुन सकती हैं, कहीं हल्की वॉक पर जा सकती हैं, किताब पढ़ सकती हैं, पेंटिंग कर सकती हैं, डांस कर सकती हैं, मेडिटेशन कर सकती हैं या फिर सिर्फ़ ख़ामोशी से अपने विचारों को शब्दों में ढालकर डायरी भी लिख सकती हैं। प्रकृति के साथ भी थोड़ा वक़्त बिताना फ़ायदेमंद हो सकता है। चाहे कुछ ख़ास करें या कुछ भी न करें, आपके मी टाइम का फैसला भी आपका अपना होना चाहिए। ये वीकडेज़ भी हो सकता है, वीकएंड भी, फ़र्क दिन या समय से नहीं पड़ता है,

इससे फ़ायदा क्या होगा

मी टाइम की आदत एक दिन में नहीं पड़ती। जब पूरी ज़िंदगी दूसरों के बारे में ही सोचा हो तो अचानक से अपने बारे में सोचना शुरू कर देना आसान नहीं होता। फिर भी आपको कोशिश करनी ही होगी। इस वक़्त का उपयोग जब आप अपने लिए करना शुरू करेंगी तो धीरे-धीरे आपका ध्यान अपने बढ़ते या घटते वज़न की तरफ़ भी जाएगा। आप पहले कितनी सोशल होती थीं, अब कितना सिमटती जा रही हैं। पहले आपके क्या-क्या ऐसे शौक होते थे, जिनके बिना आप चैन ही नहीं लेती थीं या फिर अपने खान-पान या रुटीन पर आपने लास्ट टाइम कब ध्यान दिया था। सबके मन को पढ़ना तो वक़्त ने आपको सिखा दिया, लेकिन अपने लिए सोचना आप कब का भुला चुकी हैं, क्या यह बात याद है आपको? नहीं न! सो यही वह प्वॉइंट है, जहां से आपको यू टर्न लेना है और इस रास्ते को अपनी तरफ़ मोड़ना है। जब आप अपने लिए वक़्त निकालने लगेंगी तो उसमें आपकी सोच, आपकी मर्ज़ी, आपकी निजी पसंद-नापसंद वग़ैरह की भी गुंजाइशें निकलेंगी। यह न सिर्फ़ आपके तन-मन और मस्तिष्क की सेहत के लिए लाभदायक साबित होगा, बल्कि आपकी रचनात्मकता, कार्यशक्ति और सहनशीलता बढ़ेगी और अवसाद कम होगा। यकीन मानिए, ऐसा होना आज के वक़्त में किसी वरदान से कम नहीं है।

क्या हैं मी टाइम न होने के नुकसान

मी टाइम न होने के नुकसान अब इतनी बातों के बाद हमें अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है। आप खुद भी समझ ही सकती हैं कि अगर आपकी अपनी ज़िंदगी में ख़ुद अपने लिए ही गुंजाइशें न हों तो आसान लगती ज़िंदगी कब मुश्किलों से घिर जाएगी, आपको पता भी नहीं चलेगा। सबके लिए सोचते-सोचते एक समय ऐसा आ सकता है, जब आपको लगने लग सकता है कि आप सभी के लिए हलकान रहती हैं, जबकि किसी और को आपकी कोई चिंता ही नहीं है। ये सोच धीरे-धीरे अवसाद का रूप ले सकती है और अवसाद कई तरह की छोटी-बड़ी बीमारियों में बदल सकता सकता है। सो इसीलिए तो हम कहते हैं कि साथ के अकेलेपन से अकेलेपन का साथ बेहतर, लेकिन यह भी याद रखिएगा कि एकांत और अकेलेपन में फ़र्क होता है। अकेलापन मजबूरी हो सकती है, लेकिन एकांत आपका अपना चयन होता है, जो आपकी रचनात्मकता को बढ़ाकर बतौर इंसान आपको थोड़ा और बेहतर बना देता है। सो याद रखिए कि भुलाना नहीं है अपना मी टाइम।

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