किताबें झांकती हैं बंद अलमारी के शीशों से : गुलज़ार

गुलज़ार साहब की नज़्म इन बेजान किताबों के एहसास ऐसे बयान करती है, जिसे पढ़कर आप इन बेजुबान किताबों से भी बातें करने लगेंगे।

न्यूज़ साहित्य
Gulzar nazm kitabein jhankti hain band almari ke sheeshon se

Gulzar poetry: आज के दौर में जब सब कुछ डिजिटल होता जा रहा है, ऐसे में किताबें अपने असल रूप को छोड़कर इ-बुक के फॉर्म में कहीं किंडल, कहीं इबुक रीडर और न जाने किस किस रूप में आ गई हैं। ऐसे में भी वर्चुअल किताबों की जगह असली किताबों को पढ़ने का जो मज़ा है, केवल वहीं बयान कर सकता है, जिसने किताबों को सिर्फ पढ़ा नहीं हो, महसूस भी किया हो। गुलज़ार साहब की नज़्म इन बेजान किताबों के एहसास ऐसे बयान करती है, जिसे पढ़कर आप इन बेजुबान किताबों से भी बातें करने लगेंगे।

किताबें झांकती हैं बंद आलमारी के शीशों से

किताबें झांकती हैं बंद आलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकातें नहीं होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं
अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर
बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है
जो कदरें वो सुनाती थी कि जिनके
जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधरे-उधरे हैं
कोई सफ़ा पलटता हूं तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो अल्फ़ाज़
जिन पर अब कोई मानी नहीं उगते
ज़बां पर जो ज़ायका आता था जो सफ़ा पलटने का
अब ऊँगली क्लिक करने से बस झपकी गुज़रती है
किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, वो कट गया है
कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर
नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के
किताबें मंगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा
वो शायद अब नही होंगे!!

साभार : कविता कोश डॉट कॉम

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