Kazi Nazrul Islam birthday: कृष्ण भक्ति के गीत रचने वाले काज़ी नज़रुल इस्लाम

Kazi Nazrul Islam के लिखे उपन्यास और कविताएं इतने प्रसिद्ध हुए कि अंग्रेज़ सरकार को इनके साहित्य में विद्रोह की भावना नज़र आने लगी। सन 1922 में लिखी नज़रुह की एक कविता विद्रोही तो इतनी मशहूर हुई कि ये आम जनमानस के बीच लोकप्रिय हो गए।

साहित्य

काज़ी नज़रुल इस्लाम, (Kazi Nazrul Islam)यानी एक साहित्यकार, देशप्रेमी, कृष्ण भक्त और बांग्लादेश के राष्ट्रीय कवि ऐसी न जाने कितनी ही उपाधियां हैं, जो इनके नाम के आगे शायद छोटी पड़ जाएंगी। इस गंगा-जमुनी तहज़ीब के कवि के गीत पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश, दोनों ही जगह लोगों द्वारा पंसद किए जाते हैं। काज़ी नज़रुल इस्लाम सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल थे। इन्होंने साहित्य की सभी विधाओं, चाहें वे कविता हों, गीत हों, उपन्यास हों या कहानियां, अपनी रचनाओं से समृद्ध किया। इनकी रचनाओं में मानवता, समानता, न्याय साम्राज्यवाद का विरोध, धार्मिक भक्ति सभी शामिल थे।

पश्चिम बंगाल के चुरुलिया गांव में एक गरीब परिवार में 24 मई, 1899 को काज़ी नज़रुल इस्लाम का जन्म हुआ। इनके पिता का नाम फ़कीर अहमद और माता ज़ाहिदा ख़ातून के चार बच्चे थे। इनके पिता एक इमाम और स्थानीय मस्जिद के कार्यवाहक थे। पिता की मौत के बाद वे भी मस्जिद की देखभाल करने लगे। अगर आज के वक्त की बात करें तो शायद किसी को यह बात अजीब लग सकती है कि एक बंगाली मुसलमान मस्जिद में काम करते-करते अचानक कृष्ण भक्त कैसे बन गया। असल में काज़ी नज़रुल के एक चचा थे, फ़ज़ले करीम, जो अपना एक थिएटर ग्रुप चलाते थे। पूरे पूर्वी भारत में घूम-घूमकर ये ग्रुप छोटी-छोटी नृत्य नाटिकाएं करता था। ये छोटी-छोटी नृत्यनाटिकाएं अधिकांश स्थानीय लोककथाओं पर आधारित होती थीं। चूंकि इन लोककथाओं में अधिकांश कथानक हिंदू धार्मिक ग्रंथों से ली गई होती थीं, इसलिए नज़रुल ने बंगाली और संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया और रामायण व महाभारत के पात्रों पर अपने थिएटर ग्रुप के लिए नाटक और कविताएं लिखीं।

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इन्हीं सब घटनाओं के बीच करीब 17 साल की उम्र में नज़रुल मात्र सत्रह बरस की छोटी सी उम्र में ब्रिटिश इंडियन आर्मी में भर्ती हो गए और इन्हें प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मेसोपोटामिया भेज दिया गया। विश्व युद्ध खत्म होने के दो साल के बाद ये नौकरी छोड़कर वापस लौट आए और इन्होंने अपना सारा समय साहित्य और संगीत को समर्पित कर दिया। इनके लिखे उपन्यास और कविताएं इतने प्रसिद्ध हुए कि अंग्रेज़ सरकार को इनके साहित्य में विद्रोह की भावना नज़र आने लगी। सन 1922 में लिखी नज़रुह की एक कविता विद्रोही तो इतनी मशहूर हुई कि ये आम जनमानस के बीच लोकप्रिय हो गए।

इसी बीच इन्होंने धूमकेतु नामक एक पत्रिका शुरू की। इनके लेखों कविताओं और पत्रिका के कारण अंग्रेज़ सरकार ने इन पर राष्ट्रद्रोह का आरोप लगाकर इन्हें जेल भेज दिया। जेल से वापस आने के बाद तात्कालिक सरकार ने उनकी किताब बिषेर वंशी पर रोक लगा दी गई। श्रीकृष्ण की बांसुरी को आधार बनाकर लिखी गई इस किताब पर काफी चर्चाएं हुईं। इसके बाद तो नज़रुल पर कृष्ण भक्ति का ऐसा बुखार चढ़ा कि उन्होंने अपने तमाम गीत और कविताएं कृष्ण भगवान को ही समर्पित कर रच डाले। इतना ही नहीं, उन्होंने प्रमिला नामक एक हिंदू लड़की से विवाह तक कर डाला, जिसका तात्कालिक समाज ने काफी विरोध किया। प्रमिला ब्रह्म समाज से थीं और तब के धर्म के ठेकेदारों ने जब उन पर अपनी पत्नी के धर्मपरिवर्तन का दबाव डाला तो नज़रुल ने इस बात से साफ इंकार कर दिया।

एक वक्त ऐसा भी आया कि जब नज़रुल पर कृष्ण भक्ति की ऐसी दीवानगी छाई कि उन्होंने अपने बेटों के नाम कृष्णा मोहम्मद, काज़ी सब्यसाची, काज़ी अनिरुद्ध और अरिंदम ख़ालिद रख डाले। इतना ही नहीं उन्होंने आसनसोल छोड़कर कृष्णा नगर में रहने तक का निर्णय ले डाला।

इसके अलावा नज़रुल ने इस्लामिक गीत और ग़ज़लें भी लिखीं, जो आज भी बांग्लादेश में मौके-बेमौके गाई जाती हैं। नज़रुल ने समाज के हर उपेक्षित तबके पर कविताएं लिखीं, चाहे वे मज़दूर हों, गरीब हों या वेश्याएं हों । उनकी कविताएं बेहद ही मार्मिंक और दिल को छू लेने वाली थीं। नज़रूल ने करीब पांच सौ से भी अधिक भजन लिखे, जो न केवल कृष्ण और राधा को लेकर थे, बल्कि उनमें लक्ष्मी और पार्वती और महादेव भी शामिल थे। नज़रुल ने करीब तीन हज़ार से अधिक गीतों की रचना की तथा कई गीतों को आवाज़ भी दी, जिन्हें आजकल नज़रूल संगीत या नज़रुल गीति के नाम से भी जाना जाता है। नज़रुल ने साहित्य और गीतों के अलावा फिल्मों के लिए भी काम किया। नज़रुल ने एक बंगाली फिल्म ध्रुव भक्त का निर्देशन भी किया। वे पहले बंगाली मुस्लिम फिल्म निर्देशक थे। इसके बाद वे 1939 में कोलकाता रेडियो स्टेशन पर म्यूजिकल प्रोग्राम के सुपरवाइजर भी रहे। उसके बाद एक वक्त ऐसा भी आया, जब उन्हें बीमारी के चलते अपना साहित्यकर्म छोड़ना पड़ना और एक अख़बार में नौकरी करनी पड़ी।

1941 से वे काफी बीमार रहने लगे और उन्हें कुछ मानसिक परेशानियों का सामना भी करना पड़ा। 1952 में उन्हें रांची के एक मानसिक अस्पताल में भर्ती करवाया गया। वहां भी उनकी हालत में कोई खास सुधार नहीं हुआ तो उनके प्रशंसकों ने पैसा इकट्ठा करके उन्हें इलाज के लिए लंदन और वियेना भेजा, लेकिन फिर भी वे ठीक नहीं हो पाए और वापिस कोलकाता लौट आए। सन 1976 में 29 अगस्त को उनकी मौत हो गई। उन्हें ढाका यूनिवर्सिटी में दफ़नाया गया। बांग्लादेश ने तब दो दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया। भारत में भी इनकी मौत पर मौन श्रद्धांजलि दी गई। बांग्लादेश ने इन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि से भी नवाज़ा। नज़रुल के शहर आसनसोल में उनके नाम पर यूनिवर्सिटी भी बनाई गई।

आइए, सिटीस्पाइडी में पढ़िए नज़रुल इस्लाम के जन्मदिन के मौके पर कृष्ण पर उनके भजन

1.

कृष्ण कन्हइया आओ मन में मोहन मुरली बजाओ।
कान्ति अनुपम नील पद्मसम सुन्दर रूप दिखाओ।
सुनाओ सुमधुर नूपुर गुंजन
“राधा, राधा” करि फिर फिर वन वन
प्रेम-कुंज में फूलसेज पर मोहन रास रचाओ;
मोहन मुरली बजाओ।

राधा नाम लिखे अंग अंग में,
वृन्दावन में फिरो गोपी-संग में,
पहरो गले वनफूल की माला प्रेम का गीत सुनाओ,
मोहन मुरली बजाओ।

2.

जयतू श्रीकृष्ण श्रीकृष्ण मुरारी शंखचक्र गदा पद्मधारी।
गोपाल गोविन्द मुकुन्द नारायण परमेश्वर प्रभू विश्व-बिहारी।।
सूर नर योगी ऋषि वही नाम गावे,
संसार दुख शोक सब भूल जावे,
ब्रह्मा महेश्वर आनन्द पावे गावत अनन्त ग्रह-नभचारी।।
जनम लेके सब आया ये धराधाम
रोते रोते मैं प्रथम लिया वो नाम।
जाउंगा छोड़ मैं इस संसार को सुनकर कानों में भयहारी।।

3.

जगजन मोहन संकटहारी
कृष्णमुरारी श्रीकृष्णमुरारी।
राम रचावत श्यामबिहारी
परम योगी प्रभू भवभय-हारी।।
गोपी-जन-रंजन ब्रज-भयहारी,
पुरुषोत्तम प्रभु गोलक-चारी।।
बंसी बजावत बन बन-चारी
त्रिभुवन-पालक भक्त-भिखारी,
राधाकान्त हरि शिखि-पाखाधारी
कमलापति जय गोपी मनहारी।।

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