Pash Birthday Anniversary: ‘सबसे खतरनाक’ होता है सपनों का मर जाना, पाश की कविता

अवतार सिंह संधू ‘पाश’ एक ऐसा नाम, जिसके लेते ही उस समय के शासकवर्ग के माथे पर पसीना आ जाता था। सिर्फ अपनी कलम के ज़रिये इस शख्स ने पूरे पंजाब में क्रांति की अलख जगा दी थी।

न्यूज़ साहित्य

Pash Birthday Anniversary : अवतार सिंह संधू ‘पाश’ एक ऐसा नाम, जिसके लेते ही उस समय के शासकवर्ग के माथे पर पसीना आ जाता था। सिर्फ अपनी कलम के ज़रिये इस शख्स ने पूरे पंजाब में क्रांति की अलख जगा दी थी। 9 सितम्बर, 1950 को पंजाब के जालंधर ज़िले के गांव तलवंडी सलेम में जन्मे अवतार सिंह संधू बहुत कम उम्र में ही अपनी क्रांतिकारी पंजाबी रचनाओं के कवि पाश के नाम से मशहूर हो गए थे।

मात्र पंद्रह साल की उम्र में अपनी पहली कविता लिखी और कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ गए। उन्नीस वर्ष की छोटी सी आयु में इन्हें जेल में डाल दिया गया और भीषण यातनाएं दी गईं। वैसे तो पाश पंजाबी कवि थे, लेकिन हिंदी जगत में भी पाश की प्रसिद्धि कम नहीं है। अपनी क्रांतिकारी कविताओं के बदले में पाश की ठीक उसी दिन हत्या कर दी गई थी, जिस दिन भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई थी, यानी शहीदी दिवस वाले दिन। शासकवर्ग की लाख कोशिशों के बावजूद पाश का नाम मिट न सका और आज भी साहित्य के आसमान पर सूरज की तरह चमक रहा है।

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सिटीस्पाइडी डॉट इन में हम लाए हैं कवि पाश की एक क्रांतिकारी कविता ‘सबसे खतरनाक’

सबसे ख़तरनाक/पाश

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक़्पत निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्बैत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्याककांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्मा  का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्मु के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती।
(साभार- कविताकोश)

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