फरीदाबाद के पशु प्रेमी रवि दुबे की टीम ने केदारनाथ में किया घोड़ों और खच्चरों का इलाज

केदारनाथ धाम की यात्रा को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले घोड़े-खच्चरों की ही कोई कद्र नहीं की जा रही है। इनके लिए न ही आराम करने की कोई समुचित व्यवस्था है और न ही इनके घायल होने पर इलाज की कोई व्यवस्था होती है।

Faridabad न्यूज़

Faridabad: केदारनाथ धाम की यात्रा को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले घोड़े-खच्चरों की ही कोई कद्र नहीं की जा रही है। इनके लिए न ही आराम करने की कोई समुचित व्यवस्था है और न ही इनके घायल होने पर इलाज की कोई व्यवस्था होती है। यहां तक कि मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार करने की बजाए इन्हें नदियों में फेंक दिया जाता है।

केदारनाथ पैदल मार्ग पर घोड़े-खच्चरों के मरने के बाद मालिक एवं हॉकर उन्हें वहीं पर फेंक रहे हैं, जो सीधे मंदाकिनी नदी में गिरकर नदी को प्रदूषित कर रहे हैं। ऐसे में केदारनाथ क्षेत्र में महामारी फैलने से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। इस तरह की जानकारी मिलने के बाद फरीदाबाद स्थित पीपुल फॉर एनिमल्स ट्रस्ट के संचालक रवि दुबे की टीम ने मेक्सिको के अपने स्वयंसेवी के साथ गौरीकुंड के केदारनाथ ट्रैकिंग क्षेत्र में कई घोड़ों का इलाज किया। टीम में पीपुल फॉर एनिमल्स ट्रस्ट के संचालक रवि दुबे, नवीन चौहान, मुक्तक, जगमोहन दीक्षित और विक्टर मुख्य रूप से शामिल थे।

रवि दुबे ने बताया कि टीम ने वहां तीन दिन बिताए। इस दौरान दर्जनों घायल और बीमार घोड़ों और खच्चरों का इलाज किया। साथ ही इनके मालिकों को दवाइयां दी हैं और उन्हें जागरूक किया कि वे खुद इन बेजुबानों का कैसे इलाज कर सकते हैं। तीन दिन का शिविर लगाने क बाद उनकी टीम वापस लौट आई। रवि दुबे ने बताया कि उनकी टीम करीब 500 किमी लंबी दूरी तय कर वहां पशुओं के इलाज के लिए पहुंची थी।

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बता दें कि समुद्र तल से 11750 फीट की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 18 किमी की दूरी तय करनी होती है। इस यात्रा के दौरान यात्री को केदारनाथ धाम पहुंचाने में घोड़े-खच्चर अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन इन जानवरों के लिए भरपेट चना, भूसा और गर्म पानी भी नहीं मिल पा रहा है।

तमाम दावों के बावजूद पैदल मार्ग पर एक भी स्थान पर घोड़ा-खच्चर के लिए गर्म पानी की व्यवस्था नहीं है। दूसरी तरफ संचालक एवं हॉकर रुपए कमाने के लिए घोड़े-खच्चरों से एक दिन में गौरीकुंड से केदारनाथ के दो से तीन चक्कर लगवा रहे हैं। रास्ते में उन्हें पल भर भी आराम नहीं मिल पा रहा है, रवि दुबे का कहना है कि इस कारण वह थकान से चूर होकर दर्दनाक मौत के शिकार हो रहे हैं। सैंकड़ो घोड़े-खच्चरों की बीमारी अथवा चोट लगने से मौत हो चुकी है। जबकि कुछ घोड़े-खच्चरों की गिरने से और पत्थर की चपेट में आने से मौत हुई है।

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