कठिन परिश्रम और अनथक प्रयासों के बाद बन पाईं नृत्यांगना : कविता द्विबेदी

कविता कहती है कि दूर से देखने पर किसी को भी मेरा नृत्यांगना बनना आसान लगेगा कि मेरे पिता ओडसी नृत्य के महान गुरु थे, लेकिन आपको जानकर हैरत होगी कि यही मेरे जीवन का सबसे बड़े संघर्ष की शुरुआत थी कि मेरे पिता ओडिसी नृत्य के महान गुरु थे।

न्यूज़ शख़्सियत

कुछ लोगों का जीवन दूर से देखने पर बहुत सफल और अद्भुत लगता है, लेकिन वास्तव में शायद ही किसी को इस सफलता के पीछे के संघर्ष की कहानी पता हो। ओडिसी नृत्य की प्रसिद्ध नृत्यांगना कविता द्विबेदी का जीवन भी करीब करीब ऐसा ही है।

वैसे तो कविता द्विबेदी (Kavita Dwibedi) का जन्म ओडिसी नृत्य के एक महान गुरु हरेकृष्ण बेहरा के यहां हुआ। कविता कहती है कि दूर से देखने पर किसी को भी मेरा नृत्यांगना बनना आसान लगेगा कि मेरे पिता ओडसी नृत्य के महान गुरु थे, लेकिन आपको जानकर हैरत होगी कि यही मेरे जीवन का सबसे बड़े संघर्ष की शुरुआत थी कि मेरे पिता ओडिसी नृत्य के महान गुरु थे। मेरे पिता नहीं चाहते थे कि मैं शास्त्रीय नृत्यांगना बनूं। वे चाहते थे कि मैं एक आईएस अधिकारी बनूं। मेरी मां फिर भी मेरे नृत्यांगना बनने में मुझे समर्थन करती थी, लेकिन मेरे पिता किसी भी तरह इसके लिए तैयार नहीं थी। अपने पिता को गुरु के रूप में प्राप्त करने के लिए मुझे अनथक प्रयास और कठिन मेहनत करनी पड़ी।

Kavita Dwibedi

कविता बताती है कि मेरे जीवन की सबसे मुश्किल घड़ी वह थी जब मैंने शास्त्रीय नृत्य को अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बनाया। हरेकृष्ण बेहरा बेटी होने के कारण लोगों को मुझे से बहुत ज्यादा अपेक्षाएं थीं। ऊपर से सबसे बड़ी बात कि मेरे पिता ने साफ कह दिया कि डांस के क्षेत्र में मुझे खुद अपना रास्ता बनाना होगा। डांस के क्षेत्र में करियर बनाने में वे मेरी कोई सहायता नहीं करेंगे और मैं न उनके नाम या प्रभाव का उपयोग कर सकती हूं।

ओडिसी नृत्य की दुनिया में कविता का सफर मात्र सात साल की उम्र में शुरू हुआ। नृत्य सीखने के लिए कविता को वर्षों तक अथक प्रशिक्षण के दौर से गुजरना पड़ा। बहरहाल सभी चुनौतियों का सामना करते हुए आखिरकार कविता ने अपने आप को सिद्ध कर दिखाया। 1988 में रूसी केंद्र, नई दिल्ली में एक कलाकार के रूप में उनका पहला सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ। यह प्रदर्शन उनके जीवन में मील का पत्थर साबित हुआ। इसके बाद कविता को इंडियन काउंसिल ऑफ क्ल्चरल रिलेशन (आईसीसीआर) के साथ सूचीबद्ध किया गया। 1990 में कविता ने गुरु शिष्य परम्परा के तहत स्थापित सरकार में अपना पहला प्रदर्शन किया और सरकारी छात्रवृत्ति प्राप्त की।

कोणार्क नृत्य महोत्सव में नृत्य प्रस्तुति कविता की अगली बड़ी जीत थी जिसका वह सपना देखती थीं। महज 22 साल की उम्र में उन्हें कोणार्क फेस्टिवल में सोलो परफॉर्म करने का मौका मिला। कविता उन दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि उन दिनों मेरी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। कोणार्क महोत्सव में प्रस्तुति देने के लिए मुझे अपनी पोशाक खरीदने के लिए अपनी सोने की बालियां तक बेचनी पड़ीं। इसके बाद मुझे और बड़े मंचों पर प्रदर्शन का मौका मिला जैसे खजुराहो, कान्स और मामल्लापुरम (तमिलनाडु)।

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कविता बताती हैं कि इतना सब होने के बावजूद अपने पिता से ओडिसी नृतक के रूप में स्वीकृति मिलना अब भी एक दिवा स्वप्न ही था। आखिर एक दिन वह भी आया जब मेरा वह सपना भी पूरा हो गया। कविता ने पिंगला (2009) एक नृत्य नाटिका में नृत्य किया। नृत्य नाटिका की नायिका एक वेश्या थी। यह एक ऐसा विषय था जो कई अवधारणाओं को तोड़ता था। मेरे लिए यह नृत्य नाटिका काफी चुनौतीपूर्ण था। मेरी चुनौती तब और बढ़ गई जब मुझे यह पता चला की दर्शक दीर्घा के बीच मेरे पिता भी विराजमान हैं। कविता कहती है कि मैंने अपने नृत्य के जरिए इस किरदार की जटिल संवदेनाओं को उभारने का पूर्ण प्रयास किया और जब मेरा नृत्य समाप्त हुआ तो मेरे पिता की आंखों में आंसू थे। उस दिन उन्होंने स्वीकार किया कि मैं डांसर बन गई हूं। यह दिन मेरे जीवन का सबसे बड़ा दिन था।

कविता कहती हैं कि नर्तकी के तौर पर मैं अपनी कला के प्रति पूरी तरह से निष्ठावान हूं। मेरे लिए मेरे दर्शकों की गुणवत्ता मतलब रखती है। मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मंच छोटा है या बड़ा। मैं हर प्रदर्शन में अपना सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करती हूं। यह एक बात है जो मैंने अपने पिता से सीखी है। आज वर्षों तक मंच पर प्रदर्शन के बाद भी किसी प्रदर्शन से पहले मैं घबरा जाती हूं, लेकिन जब एक बार नृत्य करना आरंभ करती हूं तो सब भूल जाती हूं। मेरे भीतर का सच्चा कलाकार अपनी कला के साथ एकाकार हो जाता है। कविता कहती हैं कि कोई भी कला हो वह एक साधना की तरह होती है और कला तभी परिपूर्ण होती है जब कला और कलाकार एक हो जाते हैं। यह एक अपनी ही तरह की एक आध्यात्मिकता है। मेरे पिता कहा करते थे ये मंच तुम्हारा है वहां अपना शत प्रतिशत दो।

कविता समय के साथ नृत्य के पेशे में आए बदलाव के बारे में कहती हैं कि मैं खुद मानती हूं कि डांस से कोई पर्याप्त कमाई नहीं कर सकता। इसीलिए जीवन चलाने के लिए अच्छे से पढ़ाई लिखाई जरूरी है और नृत्य के अलावा एक अच्छी नौकरी। प्रतिस्पर्धा बहुत बढ़ गई है और इस दौर में जीवन चलाना अपने आप में एक कठिन कार्य है। माता पिता अपने बच्चों को नृत्य सीखने को तो प्रोत्साहित करते हैं लेकिन केवल एक शौक के तौर पर। सौ में से एक दो लोग ही होते हैं जो नृत्य को पेशे के तौर पर चुनते हैं।

कविता एक संचारी नाम की संस्था भी चलाती हैं। इस संस्था के द्वारा वे छोटे बच्चों को ओडिसी नृत्य सिखाती हैं। बदलते वक्त के साथ कविताा ने अपने नृत्य नाटकों में ‘सेव गर्ल चाइल्ड’ और ‘ग्लोबल वार्मिंग’ में समकालीन सामाजिक विषयों को अपनाया है।

 

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