संघर्ष के साथ लगातार मिलती सफलता ने संघर्ष की कठोरता का एहसास ही नहीं होने दिया- आलोक दीक्षित

आलोक दीक्षित ने एसिड अटैक सर्वाइवर की पीड़ा को समझते हुए वर्ष 2013 में दिल्ली से ‘स्टॉप एसिड अटैक अभियान’ की शुरुआत की।

न्यूज़ शख़्सियत
Continuing success with struggle did not allow us to realize the rigors of struggle - Alok Dixit

आलोक दीक्षित (Alok Dixit)ने एसिड अटैक सर्वाइवर की पीड़ा को समझते हुए वर्ष 2013 में दिल्ली से ‘स्टॉप एसिड अटैक अभियान’ (stop acid attack)की शुरुआत की। इसमें देश-भर के एसिड अटैक सरवाइवर्स को अपने साथ न सिर्फ जोड़ा, बल्कि उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास भी किया। ‘शीरोज़ कैफे’ इसी सिलसिले की एक कड़ी है, जो एसिड अटैक सरवाइवर्स द्वार ही संचालित होती है। हाल ही में जब नोएडा में शीरोज़ कैफे श्रृंखला की एक कड़ी जुड़ी तो उस मौके पर हुई मुलाकात में हमने आलोक दीक्षित से इस विषय से जुड़ी बहुत सी बातों पर चर्चा की।

आलोक दीक्षित ने जो मुहिम शुरू की है, उसके बारे में बताते हुए वे कहते हैं कि वे पत्रकारिता से जुड़े थे। इस दौरान एसिड अटैक पीड़ितों पर रिपोर्टिंग करते हुए एहसास हुआ कि इनकी मदद कोई संस्था नहीं कर रही है, सरकारी तंत्र का सहयोग भी इस प्रकार के पीड़ितों को नहीं मिल रहा है। इसके अलावा आम लोगों में भी इस विषय में जानकारी का घोर अभाव देखने को मिलता है। अपनी इस पहल के दौरान मैं एसिड अटैक की शिकार जिन लड़कियों से मिला, उनकी स्थिति अच्छी नहीं थी। कोई तरीका भी ठीक से नहीं सूझ रहा था, जिससे उनकी मदद की जा सके।

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आलोक आगे बताते हैं कि एक लंबे समय तक काम करने के बाद मैंने महसूस किया कि मैं इस काम को करने का ज़रिया बन सकता हूं। मुझे समाज से किसी पहल की उम्मीद करने की बजाय ख़ुद ही कोई पहल करनी चाहिए। हालांकि उस समय मेरा कुछ ऐसा प्रयास नहीं था कि मैं इनका ट्रीटमेंट कराऊं, कोई बड़ी मदद करूं या वे सुविधाएं जुटा दूं, जिनसे इन्हें कुछ मदद वक्ती तौर पर मिल जाए। मेरा मकसद इन्हें इस दर्द से उबारने के साथ-साथ ही अपने पैरों पर खड़ा होने और अपनी खोई हुई पहचान वापस पाने के लिए रास्ता तैयार करना भी था। इनकी पहचान सिर्फ़ इतनी नहीं थी कि ये एसिड अटैक सरवाइवर हैं। सो साल 2013 में यह सोचा कि एक मुहिम बाकायदा शुरू की जाए, इसके बारे में लिखा जाए, लोगों को जानकारियां दी जाएं, सोशल मीडिया पर कैंपेन चलाया जाए, जो समाज इनका बहिष्कार करता है, उसी समाज को सहयोग के लिए आगे लाया जाए। मैंने इसकी शुरुआत सोशल मीडिया से की और एक पेज बनाया। जब भी कोई इस प्रकार की खबर आती थी तो हम उसे सोशल मीडिया पर डालते थे और पीड़ित से मिलने जाते थे। धीरे-धीरे लोगों ने इस बारे में जाना और फिर एक के बाद एक कई लोग इस मुहिम के साथ जुड़ने लगे। हालांकि ये सब उतना आसान भी नहीं था, जितना आज बात करते हुए सरल लग रहा है।

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आलोक कहते हैं कि 2013 से हम लगातार संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन संघर्ष के साथ-साथ हर साल कुछ ना कुछ अचीवमेंट भी हम हासिल करते रहे, जैसे पहले कानून में बदलाव हुआ, फिर सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात को रिकॉग्नाइज़ किया और सभी लोगों को मुआवज़ा देने की बात की, फिर सरकारें भी जागरूक हुई हैं। उन्होंने पीड़ितों के इलाज की बात कही। मेरे कहने का मतलब है कि संघर्ष के साथ सफलता भी मिलती रही, इसलिए संघर्ष इतना महसूस नहीं हुआ। सब लोग साथ आए थे, एक-दूसरे के जीवन से भी लेन-देन हुआ। अगर हमने उन्हें संभल दिया तो उन्होंने भी हमें जिंदगी जीने का उदाहरण दिया. जब मैं अपनी लाइफ में कमजोर पड़ा तो इन लोगों ने ही संभाला। इनके जीवन से बढ़कर उदाहरण भला और कहां मिल सकता था मुझे।

अपनी इस मुहीम के कामकाज के बारे में बताते हुए आलोक दीक्षित कहते हैं कि हम लोग मुख्यतः 3-4 तरीके से एसिड के पीड़ितों की मदद करते हैं। अगर किसी पर एसिड अटैक हो जाए तो तत्काल मौके पर पहुंचकर, जो मदद हो सकती है, वह करते हैं, जैसे- अच्छे अस्पताल पहुंचाना, सरकार की तरफ़ से मदद दिलाना, जब पीड़ित थोड़ी बेहतर स्थिति में पहुंच जाता है, जो लॉन्ग ट्रीटमेंट होता है, उसमें सरकारी सहयोग कई बार मिलता है, कहीं पर नहीं मिलता है, तब अन्य संस्थाओं को साथ में जोड़ कर उनका इलाज कराना। एक बड़ी मदद, जो हमें लगता है कि सही मायनों में अब कर पा रहे हैं, सब को रोज़गार दिलाने की। छांव फाउंडेशन संस्था के साथ अब तक 50 से अधिक एसिड अटैक सरवाइवर जुड़ चुकी हैं। इसमें से वर्तमान में 35 नियमित रूप से काम कर रही हैं। उन्हें देखकर लगता है कि जीवन कभी थमता नहीं है। ये जीवन की साक्षात प्रेरणा स्वरूप हैं।

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