दामिनी यादव की मार्मिक कविता : मेरे पिता

जिनके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। वे पिता किस तरह से यादों का हिस्सा बनकर जीवन भर हर कदम पर साथ चलते हैं, इसी एहसास को साझा करने की कोशिश है, दामिनी यादव की ये कविता, ‘मेरे पिता’।

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बात जब मां की ममता की होती है तो जाने कितनी ही कविताएं, कितनी ही कहानियां, कितने ही क़िस्से देखने-सुनने को मिल जाते हैं, लेकिन पिता के प्यार को लेकर चीज़ें कितनी सीमित हो जाती हैं। शायद इसलिए कि पिता ख़ुद भी अपने प्यार को जताना-दिखाना नहीं जानते। वे उस ख़ामोश नींव की तरह होते हैं, जो नज़र तो नहीं आती, लेकिन जिसके कंधों पर पूरा घर टिका होता है। भले ही आज पिता के नाम पर भी साल में एक दिन मनाने का चलन शुरू हो गया है, लेकिन पिता हर दिन, हर पल में शामिल शै का नाम है। हम सभी अपने पिता को और उनके प्यार को अलग-अलग रूपों में देखते हैं, महसूस करते हैं, पर कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिनके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। वे पिता किस तरह से यादों का हिस्सा बनकर जीवन भर हर कदम पर साथ चलते हैं, इसी एहसास को साझा करने की कोशिश है, दामिनी यादव की ये कविता, ‘मेरे पिता’।

मेरे पिता

मैंने सुना है कि सुबह होने पर जो कहीं चले जाते हैं

शाम होने पर वे पिता लौट आते हैं

कई पिताओं को देखा है उंगली पकड़कर रास्ता पार कराते भी

या स्कूल के गेट तक छोड़ आते हैं

कई पिताओं को बनाते देखा है बेटियों की टेढ़ी-मेढ़ी चोटियां

कई पिता नन्ही हथेलियों को मेहंदी से सजाते हैं

कुछ पिता किचेन में कभी लज़ीज़, कभी अधपका पकाकर भी

बेटियों को खिलाते हैं,

चेहरे बना-बनाकर सुनाते हैं कहानियां रातों को कई पिता

और कई पिता आधी रातों को

नींद में डूबी बेटियों की चादर ठीक कर आते हैं

हज़ारों पिता देते दिखे हैं बेटी की डोलियों को कांधा देते

नज़रों के सामने हमेशा हाज़िर रहते

सिर्फ़ अपने पिता को ही पाया है मैंने बस

ज़िंदगी के साथ नहीं, ज़िंदगी के बाद भी साथ देते

मेरे पिता मेरी यादों में बसे हैं

मेरी ज़िंदगी की नींव में गहरे तक धंसे हैं

वे नहीं लौटेंग किसी भी शाम को

मेरी ज़िंदगी की शाम ढल जाने पर भी

पर मेरे पिता सुबह-शाम के फ़र्क से परे

मेरी ज़िंदगी के हर अंधेरे का उजाला हैं

वे मेरी उंगली थाम कर रास्ता भी पार नहीं कराएंगे

और किसी स्कूल के गेट पर मुझे छोड़कर भी नहीं आएंगे

पर जानती हूं बहुत अच्छे से कि

हर बार भटककर भी रास्ते पर आने का रास्ता

मेरे पिता ही मुझे बताएंगे

शब्दों में नहीं देंगे कोई ज्ञान मुझे

ज़िंदगी के सबक देते वक़्त को ही उस्ताद मानकर

मुझे उसे सौंप आएंगे

मेरे बाल काम में उलझे, अक्सर संवर नहीं पाते हैं

पर अनदेखी उंगलियों से मेरे पिता

अक्सर मेरे बाल संवार जाते हैं

मुझे अब उनके पकाए बहुत से ज़ायक़े याद नहीं

पर नमक का कर्ज़ चुकाना

और ज़बान को मीठा बनाना

ये मेरे पिता की सिखाई हुई रैसिपी ही है,

चेहरे बनाते पिता तो याद नहीं हैं,

पर यादों में पिता का चेहरा बार-बार

बनता-उभरता, संवरता है

इसीलिए नींद में डूबकर भी

चादरें संवारे रखने का सलीक़ा याद रहता है

मेरे पिता मेरी डोली को कांधा नहीं दे पाए

पर अपना ही नहीं, अपनों की ज़िम्मेदारी को कांधा देने के सबक

मेरे पिता ने ही हैं मुझे सिखाए।

मैं जानती हूं कि मेरे पिता वहां हैं,

जहां से कोई आता नहीं है

पर सच कहूं तो वहां पहुंचा कोई पिता

कभी अपनी बेटियों से दूर जाता ही नहीं है।

-दामिनी यादव

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