Hayagreeva Jayanti 2022 : जानिए कौन हैं हयग्रीव भगवान, कब मनाई जाती हैं इनकी जयंती

नई दिल्ली। सनातन धर्म में श्रावण मास का विशेष महात्मय है। इसी माह में भगवान हयग्रीव जंयती मनाई जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हर वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को हयग्रीव जंयती मनाई जाती है। श्रावण मास की पूर्णिमा को रक्षाबंधन का त्योहार भी मनाया जाता है। ज्योतिषियों का कहना है कि श्रावण […]

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नई दिल्ली। सनातन धर्म में श्रावण मास का विशेष महात्मय है। इसी माह में भगवान हयग्रीव जंयती मनाई जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हर वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को हयग्रीव जंयती मनाई जाती है। श्रावण मास की पूर्णिमा को रक्षाबंधन का त्योहार भी मनाया जाता है। ज्योतिषियों का कहना है कि श्रावण मास की पूर्णिमा 11 अगस्त से लेकर 12 अगस्त तक मनाई जाएगी। इसी कारण हयग्रीव जंयती 11 अगस्त दिन पूर्णिमा के दिन मनाई जाएगी। माना जाता है कि भगवान विष्णु के 24 अवतारों में से हयग्रीव भी एक प्रमुख अवतार हैं। भगवान हयग्रीव के अवतार को लेकर पुराणों में दो कथाएं प्रमुख रूप से प्रचलित हैं। आइए सिटी स्पाइडी डॉट इन में जानते हैं भगवान विष्णु की हयग्रीव अवतार की कथा। आखिर भगवान विष्णु को क्यों लेना पड़ा हयग्रीव अवतार।

भगवान हयग्रीव के अवतार की पहली कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार हयग्रीव नामक असुर ने देवी महामाया की घोर तपस्या की और देवी महामाया को प्रसन्न कर अमरता का वरदान मांगा। देवी महामाया ने उस असुर को अमरता का वरदान देने से इंकार कर दिया और कहा कि तुम कोई और वरदान मांग लो। तब उस असुर हयग्रीव ने देवी महामाया से वरदान मांगा कि उसकी मृत्यु किसी हयग्रीव के हाथों ही हो। देवी ने उसे उसका मनचाहा वरदान दे दिया। असुर हयग्रीव अपने मन का वरदान प्राप्त कर तीनों लोकों में अत्याचार करने लगा। उसका आतंक इतना बढ़ गया कि उसने ब्रह्मा जी से सभी वेद छीन लिए। सारे देव असुर हयग्रीन के आतंक से त्रस्त हो गए।

उधर बैंकुण्ठ लोक में विष्णु भगवान अपनी लीलाओं में व्यस्त माता लक्ष्मी को देखकर मुस्करा रहे थे। मां लक्ष्मी को लगा कि भगवान विष्णु उनका उपहास कर रहे हैं इसलिए मां लक्ष्मी ने विष्णु भगवान को श्राप दिया कि उनका सिर धड़ से अलग हो जाए। माता लक्ष्मी के इस श्राप के कारण कुछ समय बीतने पर भगवान विष्णु योगनिद्रा के दौरान अपने धनुष की प्रत्यंचा को चढ़ाकर और उसे धरती पर टिकाकर एवं बाण की नोंक को अपने गर्दन रखकर सो गए।

उधर हयग्रीव के आतंक से त्रस्त जब सभी देवी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए तो उन्होंने देखा कि भगवान अपना सिर तीर के मस्तक पर रखकर योग निद्रा में विराजमान हैं, तब भगवान ब्रह्मा ने एक कीड़े को उत्पन्न किया और उस कीड़े ने भगवान विष्णु की धनुष की प्रत्यंचा काटी दी। इससे भयंकर आवाज के साथ भगवान विष्णु का सिर कट गया और देखते ही देखते वह सिर अदृश्य हो गया। तब देवी महामाया ने ब्रह्मा जी को आज्ञा दी कि घोड़े का मस्तक काटकर विष्णु भगवान के सिर पर जोड़ दिया जाए। इस प्रकार भगवान विष्णु ने हयग्रीव अवतार धारण किया।

हयग्रीव अवतार लेकर भगवान विष्णु ने असुर हयग्रीव से युद्ध किया और उस असुर का वध करके वेदों को ब्रह्मा जी को वापस लौटा दिया। और सभी देवी देवताओं को हयग्रीव के आतंक से मुक्ति प्रदान की।

हयग्रीव अवतार की एक अन्य कथा

पुराणों में वर्णित एक दूसरी कथा के अनुसार एक बार मधु और कैटभ नामक दो राक्षसों ने तीनों लोकों में इतना आतंक मचाया कि सभी देवी देवता उसके आतंक से त्रस्त हो गए। मधु और कैटभ दोनों राक्षसों ने भगवान ब्रह्मा से सारे वेद छीन लिए और उन वेदों को लेकर दोनों राक्षस रसातल में चले गए। तब भगवान ब्रह्मा ने विष्णु भगवान से प्रार्थना की। ब्रह्मा जी के आग्रह पर भगवान विष्णु ने हयग्रीव अवतार धारण कर मधु और कैटभ नामक दोनों असुरों का वध किया और सभी वेदों को रसातल से लाकर ब्रह्मा जी को वापस सौंपा।

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