उपनगरी द्वारका में बारिश की बूंदों को सहेजने के लिए बनेगा जोहड़

करीब 50 एकड़ में फैले सेक्टर तीन स्थित नेताजी सुभाष प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (NSUT) के कैंपस में बारिश की बूंदों को सहेजने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं।

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Dwarka: करीब 50 एकड़ में फैले सेक्टर तीन स्थित नेताजी सुभाष प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (NSUT) के कैंपस में बारिश की बूंदों को सहेजने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। तात्कालिक उपाय के तहत विश्वविद्यालय प्रशासन ने जहां रेन वाटर हार्वेस्टिंग की वर्तमान व्यवस्था को दुरुस्त किया है वहीं दीर्घकालिक उपाय के तहत अब परिसर में एक जोहड़ बनाया जा रहा है।

दो हजार वर्ग मीटर में फैला होगा जोहड़

एनएसयूटी परिसर में बन रहा जोहड़ करीब दो हजार वर्ग मीटर में फैला होगा। केंद्र सरकार की जल शक्ति मिशन योजना के तहत यह निर्माण हो रहा है। अधिकारियों के मुताबिक आगामी एक हफ्ते के भीतर योजना का टेंडर पास हो जाएगा और जुलाई में योजना पर काम शुरू हो जाने की पूरी उम्मीद है। जोहड़ बनने से न सिर्फ आसपास के इलाके का भूजल स्तर बढ़ेगा बल्कि भूजल की गुणवत्ता भी बढ़ेगी।

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जोहड़ में डाला जाएगा शोधित पानी

मानसून के दौरान विश्वविद्यालय के करीब 50 एकड़ क्षेत्रफल में फैले हरित क्षेत्र में पानी की जरूरत नहीं होती है। उस दौरान सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट से प्राप्त शोधित जल को यहां-वहां बर्बाद करने के बजाय जोहड़ में सहेजा जाएगा। इससे पानी की बर्बादी पर विराम लगेगा और दूसरा भूमिगत जलस्तर भी बढ़ेगा। इसके लिए विश्वविद्यालय परिसर में दो वर्षा जल संचयन प्लांट लगे हैं।

पुरानी धरोहर को सहेजा

वर्ष 1990 में एनएसयूटी को द्वारका सेक्टर-3 में जमीन अवांटित हुई थी, उस समय यहां कई कुएं थे, जिसके पानी का इस्तेमाल किसान सिंचाई में किया करते थे। विश्वविद्यालय के निर्माण के दौरान कई कुएं ध्वस्त हो गए, लेकिन पांच आज भी जीवित है। अब इन पांचों का इस्तेमाल वर्षा जल संचयन के लिए किया जाता है। कुओं में जो पानी पहुंचता है, उसे तीन स्तर पर फिल्टर किया जाता है। वर्ष 2000 में इस योजना का शुभारंभ किया गया था। करीब 70 हजार वर्ग मीटर क्षेत्रफल पर गिरने वाला बारिश का पानी, जिसमें सड़क व फुटपाथ शामिल हैं, फिल्टर होकर इन कुओं के माध्यम से जमीन में जाता है।

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