Kargil Vijay Diwas : कारगिल युद्ध के 23 साल बाद भी कैप्टन अखिलेश सक्सेना के पास हैं उस युद्ध की ज्वलंत यादें

द्वारका के सेक्टर 18ए, कारगिल अपार्टमेंट निवासी कैप्टन अखिलेश सक्सेना एक रिटायर्ड सैनिक हैं जिन्होंने कारगिल युद्ध में हिस्सा लिया। मात्र चौबीस साल की छोटी सी उम्र में उन्होंने कारगिल की लड़ाई लड़ी।

Delhi न्यूज़ शख़्सियत

Kargil Vijay Diwas: कारगिल विजय दिवस साल 1999 में कारगिल युद्ध में पाकिस्तान पर भारत की जीत के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। शायद हम में से बहुत से लोग तब पैदा भी न हुए हो जब वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध लड़ा और जीता गया। यही एक वजह है कि कारगिल युद्ध के नायकों के पास बैठना और उनको सुनना बहुत महत्वपूर्ण है। हम सिटीस्पाइडी में आपके लिए लाएं हैं ऐसे ही कारगिल युद्ध के एक नायक के साथ खास बातचीत जिनके पास उस युद्ध के मैदान में किए गए बलिदानों के बारे में कहानी है, कैसे जवानों ने शत्रुओं का सामना किया और सभी प्रकार की बाधाओं को हटाते हुए आखिर में विजय प्राप्त की।

द्वारका के सेक्टर 18ए, कारगिल अपार्टमेंट निवासी कैप्टन अखिलेश सक्सेना एक रिटायर्ड सैनिक हैं जिन्होंने कारगिल युद्ध में हिस्सा लिया। मात्र चौबीस साल की छोटी सी उम्र में उन्होंने कारगिल की लड़ाई लड़ी। जिसे वे जीवन का एक ऐसा अनुभव बताते हैं जिसने उनका जीवन ही बदल कर रख दिया। उनके लिए हर साल 26 जुलाई को मनाया जाने वाला कारगिल विजय दिवस किसी उत्सव से कम नहीं है।

बेशक कारगिल युद्ध आज एक इतिहास बनकर रह गया हो। उस युद्ध पर कई फिल्में और कहानियां है जिनमें बताया गया कि यह युद्ध हिमालय की सबसे ऊंची चोटी पर लड़ा गया। चूंकि कैप्टन सक्सेना उस युद्ध का हिस्सा थे इसीलिए उनके पास उस युद्ध से संबंधित बताने के लिए बहुत सी कहानियां और अनुभव हैं। वे कहते हैं कि भले ही इस युद्ध को आज 23 साल हो गए हों, लेकिन आज भी जब उस युद्ध के बारे में बात होती है तो वे 1999 में वापस चले जाते हैं क्योंकि आज भी उनके जहन में उस युद्ध की बहुत सी ज्वलंत यादें जिंदा हैं।

कैप्टन सक्सेना बताते हैं कि साल 1999 में मैं सेना में एक युवा अधिकारी था और मेरी नई नई शादी हुई थी। अपनी शादी के लगभग दो हफ्ते बाद जब मैं अपनी पत्नी के साथ घूमने फिरने और खरीददारी करने में व्यस्त थे तभी मुझे कारगिल युद्ध में जाने का आदेश प्राप्त हुआ। वैसे तो मैं हमेशा देश के लिए लड़ने का सपना देखता था और इस बात से काफी खुश और खुद को काफी भाग्यशाली समझ रहा था कि मुझे देश सेवा का यह मौका प्राप्त हुआ लेकिन साथ ही थोड़ा नर्वस भी था। बेशक मेरी उस समय नई नई शादी हुई थी लेकिन मेरी पत्नी ने मुझे युद्ध में भेजने में बहुत सहयोग किया। मैंने तय कर लिया कि मेरे लिए किसी भी चीज से ज्यादा महत्वपूण मेरा राष्ट्र और मेरा कर्तव्य है।

वे बताते हैं कि कारगिल युद्ध लड़ना भारत के लिए बहुत ज्यादा मुश्किल था क्योंकि पाकिस्तान लंबे समय से इस युद्ध की येाजना बना रहा था। पाकिस्तान ने कारगिल की प्रमुख चोटियां पर कब्जा कर लिया था और भारतीय सेना को किसी भी कीमत पर उन पर विजय प्राप्त करनी थी। वे आगे कहते हैं कि हम उस हमले के लिए तैयार ही नहीं थे। हमारे पास पर्याप्त उपकरण नहीं थे, यहां तक पहाड़ों में पहने जाने वाले जूते तक हमारे पास नहीं थे। वैसे भी पहाड़ों पर जो लड़ाईयां लड़ी जाती हैं उनमें जो चोटी पर बैठा होता है उसके जीतने की संभावना ज्यादा होती है और दुश्मन ने पहले ही चोटी पर कब्जा कर रखा था। हमारे लिए उन चोटियों को जीतना बेहद मुश्किल था।

तोलोलिंग चोटी को जीतने के कई असफल प्रयासों के बाद आखिरकार राजपुताना राइफल्स को यह टास्क दिया गया जिसका एक हिस्सा कैप्टन अखिलेश सक्सेना थे। वह राजपूताना राइफल्स से जुड़े एक तोपखाने के अधिकारी थे और उन्हें तोलोलिंग चोटी पर विजय प्राप्त करने के लिए बटालियन का नेतृत्व करने का काम सौंपा गया था। जबकि जीतने की बहुत कम संभावना थी, कप्तान सक्सेना इसे ‘आत्महत्या मिशन’ के रूप में वर्णित करते हैं। क्योंकि कोई नहीं जानता था कि वे उस हमले से इसे जीवित रहेंगे या नहीं, कैप्टन सक्सेना और बाकी सभी ने अपने परिवार को अपने ‘अंतिम पत्र’ लिखे।

कैप्टन सक्सेना बताते हैं कि एक सैनिक भी एक भाई, एक पिता, एक पुत्र होता है। हम यह पत्र तब लिखते हैं जब हम अपने देश के लिए लड़ते हुए मर जाते हैं। हम अपने परिवार के सदस्यों से शोक नहीं बल्कि अपनी मृत्यु का जश्न मनाने के लिए कहते हैं, क्योंकि हम जीवन में किसी बड़ी चीज के लिए मरे हैं। मैंने अपनी पत्नी और अपने माता-पिता को एक पत्र लिखा था। हालांकि, अगर हम जीत जाते हैं, तो हम वापस आते हैं और उस पत्र को टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं। सौभाग्य से यह मैं था जो मेरे घर वापस आया पत्र नहीं।

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हमें अपने साथ उस युद्ध के मैदान में ले जाते हुए, कैप्टन सक्सेना हमें बताते हैं कि तोलोलिंग चोटी को जीतने के लिए हमने कई दिनों तक भोजन तक नहीं किया क्योंकि हमारे बैगों में हमने खाने के स्थान पर पर्याप्त मात्रा में गोला बारूद भर रखा था। रात भर हुई कई गोलाबारी और फायरिंग के बाद उन्होंने हमला शुरू कर दिया। सुबह होते होते हमने भारतीय तिरंगा तोलोलिंग चोटी पर फहरा दिया। हम जीत का जश्न तक नहीं मना सकते थें क्योंकि हमने अपने कई जवानों को इस निर्मम लड़ाई में मरते हुए देखा था। कैप्टन सक्सेना इस जीत को कारगिल युद्ध का टर्निंग पाइंट बताते हैं क्योंकि यह उनके लिए एक बड़ी उपलब्धि बन गई थी।

कारगिल युद्ध के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक यह था कि यह एक ऐसा युद्ध था जिसका नेतृत्व युवा अधिकारियों ने किया था। कैप्टन सक्सेना, जो उस समय केवल 24 वर्ष के थे, कैप्टन विक्रम बत्रा, विजयन थापर और मनोज पांडे जैसे प्रसिद्ध अधिकारियों और युद्ध नायकों के साथ लड़ते हुए याद करते हैं, वो कहते हैं कि वे उस समय उनसे भी छोटे थे। उनका कहना है कि यह उनका युवा खून था जो -15 डिग्री तापमान में भी, बिना भोजन और पानी के वे न केवल खुद को जीवित रख रहे थे बल्कि देश के लिए लड़ने के लिए पूरी तरह से दृढ़ थे। उन्होंने एक प्रसंग का भी उल्लेख किया है जिसमें, भोजन प्राप्त करने के लिए संघर्ष करते हुए, वे दुश्मन की रसोई के अंदर चले गए जो कि विजय प्राप्त शिखर और एक अन्य चोटी के बीच में था जो अभी भी दुश्मन के नियंत्रण में था। हम रात में वहां गए और देखा कि वहां हलवा, बिरयानी और सूखे मेवे थे। हमने अपना सारा खाना पैक किया और अपने शिविर में वापस चले गए, जबकि हम अपने रास्ते में आने वाली गोलियों को चकमा दे रहे थे।

कैप्टन सक्सेना ने कैप्टन विक्रम बत्रा के साथ अपनी बातचीत के बारे में भी बात की। उनका कहना है कि उनसे बातचीत में विक्रम ने एक बार कहा था कि पाकिस्तान में ऐसी कोई गोली नहीं है जिस पर उनका नाम लिखा हो। कैप्टन सक्सेना कहते हैं, उसने मुझे यह भी बताया कि उसकी सगाई होने वाली है और वह किस तरह का जीवन जीने की योजना बना रहा है।

अपने अगले मिशन पर, जो थ्री पिम्पल्स चोटी पर विजय प्राप्त करना था, राजपूताना राइफल्स फिर से आगे बढ़ रहे थे। कैप्टन सक्सेना बताते हैं कि काफी गोलाबारी और फायरिंग हुई। इस हमले के दौरान कैप्टन सक्सेना का बायां हाथ छर्रे लगने से बुरी तरह घायल हो गया था। हालाँकि वह भी उनके उत्साह को कम नहीं कर सका क्योंकि वह अपने देश के लिए लड़ते रहे। उनका यह भी कहना है कि उस लड़ाई में बहुत से लोगों ने अपनी जान गंवाई क्योंकि चिकित्सा सहायता बहुत कम थी या नहीं थी।

कैप्टन सक्सेना अपने देश की अधिक सेवा करना चाहते थे, लेकिन युद्ध में घायल होने के कारण वे प्रोटोकॉल के तहत वापस सेना में शामिल नहीं हो सके। यह फिर से उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। जबकि उन्हें कारगिल युद्ध के नायक होने के नाते बहुत सारे प्रस्ताव मिले, उन्होंने अपने दम पर कुछ करने का फैसला किया। जब उन्होंने एमबीए की तैयारी शुरू की तो वह अस्पताल के बिस्तर पर थे। उन्होंने न केवल अपनी परीक्षा उत्तीर्ण की, बल्कि भारत के सर्वश्रेष्ठ एमबीए कॉलेजों में से एक में प्रवेश किया और स्वर्ण पदक विजेता के रूप में उभरे। आज, कैप्टन अखिलेश सक्सेना कॉर्पोरेट जगत में काम करते हैं, लेकिन फिर भी अपनी सफलता का श्रेय भारतीय सेना में अपने वर्षों के प्रशिक्षण को देते हैं।

कारगिल युद्ध में देश की सेवा करने वाले कैप्टन अखिलेश सक्सेना जैसे कई वीर हैं। 26 जुलाई, कारगिल विजय दिवस वह दिन है जब हम उनके बलिदानों याद करते हैं।

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