लोन फॉक्स डांसिंग के रचयिता Ruskin Bond के साथ एक मुलाकात

Ruskin Bond: अपनी आत्मकथा ‘लोन फॉक्स डांसिंग’ में रस्किन कहते हैं, उन्हें अब भी मसूरी में रहना ही बहुत पंसद है। हालांकि वे अब 88 साल के हो चुके हैं।

घुमक्कड़ी ज़िंदगीनामा न्यूज़ शख़्सियत साहित्य
A meeting with Ruskin Bond, the creator of Lone Fox Dosing

Ruskin Bond Birthday: देहरादून की घाटियां और पहाड़ मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। चूंकि मेरे माता-पिता देहरादून से ही थे, इसलिए मेरे बचपन में गर्मियों की अधिकतर  छुट्टियां वहीं बीती हैं। अक्सर हमारा परिवार दिल्ली की गर्मियों से बचने के लिए देहरादून के शांत और ठंडे वातावरण में चला जाता। जिस किसी ने भी देहरादून में समय व्यतीत किया है, वह जानता है कि रात के अंधेरे आकाश तले झिलमिलाती रोशनी में सिमटा मसूरी का हिल स्टेशन वहां से कैसा दिखाई पड़ता है! रात के समय देहरादून से मसूरी को देखना अपने-आप में अद्भुत है। यह नज़ारा आपके भीतर जादू भर देता है। इस नज़ारे ने मेरे अंदर भी एक जादू सा भर दिया, क्योंकि मैं जानता था कि यह वही जगह है, जहां कहानियों के जादूगर रस्किन बॉण्ड रहते हैं।

अपनी आत्मकथा ‘लोन फॉक्स डांसिंग’ में रस्किन कहते हैं, उन्हें अब भी मसूरी में रहना ही बहुत पंसद है। हालांकि वे अब 88 साल के हो चुके हैं। अधिकांश पर्यटक जब अपनी एसयूवी में लंढौर से चारदुकन की ओर जाते हैं तो उन्हें इस बात का आभास तक नहीं होता कि  रस्किन बॉण्ड अपने घर की पहली मंज़िल पर डेस्क के सामने बैठे होंगे और अपने जीवन पर एक और एपिसोड लिख रहे होंगे या फिर अपनी खिड़की से टिहरी रोड की ओर देख रहे होंगे या फिर  बदलते मौसम का आनंद ही ले रहे होंगे।

संभावना ये भी है कि वे अपने घर की बगल में उगने वाले शाहबलूत के पेड़ों को निहारते हों या उनकी खिड़की के सामने खड़े पेड़ पर चढ़े बालक के साथ बातचीत कर रहे हों और उसकी बातों को नोट कर रहे हों। मेरा बचपन रस्किन की लघु कहानियां पढ़ते हुए बीता द ब्लू अम्ब्रेला, एंग्री रिवर, हिडन पूल और ए फेस इन द डार्क मेरी पंसदीदा कहानियां रही हैं और उस ज़माने में मुझे बहुत पंसद थीं। जैसे-जैसे बड़ा हुआ रस्किन की अन्य रचनाएं, जैसे उनकी आत्मकथा और इसके अलावा रोड्स टू मसूरी, रेन्स इन माउंटेन और अवर ट्री स्टिल ग्रो इन देहरा मुझे बहुत लुभा गई।

इसी सब के बीच मेरे मन में रस्किन से मिलने की इच्छा धीरे-धीरे बढ़ती गई। आखिर वह दिन आ ही गया और एक दिन ‘दिल्ली विश्व पुस्तक मेले’ में लाल स्वेटर पहने और किताबों पर हस्ताक्षर करते हुए मैंने उन्हें देखा। मेरी तरह मेरी पत्नी भी रस्किन की एक बड़ी प्रशंसक हैं। हम दोनों उनके पास गए। उनसे मिले और हमने कहा कि हम मसूरी में आपके घर जाना चाहते हैं। वे मुस्कुराए और उन्होंने आराम से सहमति दे दी। साथ ही अपना नंबर भी हमें दे दिया।

बस फिर क्या था! कुछ ही हफ्ते बाद मैं और मेरी पत्नी सोनिया रस्किन के घर जाने के लिए उनके और उनके परिवार के लिए लंढौर की एक मिठाई की दुकान से मिठाइयां खरीद रहे थे। चूंकि हमने उन्हें पहले फोन कर दिया था, इसलिए वे हमारा इंतज़ार कर रहे थे।अपने लाल टिब्बा की ओर जाने वाली सड़क के निवास से पहले वे वर्षों तक लंढौर के मेपल वुड कॉटेज नाम की एक अन्य स्थान पर रहते थे। वे जिस जगह रहते हैं, वहां एक छोटा सा बगीचा है और उनका घर पहली मंज़िल पर है। लकड़ी की एक सीढ़ी उनके अपार्टमेंट की ओर जाती है।

जब हमने उनके घर की घंटी बजाई तो रस्किन वही लाल स्वेटर पहने हुए घर का दरवाज़ा खोलने के लिए आए।   रस्किन को कुछ अधिक महत्वाकांक्षी लेखकों (विशेष रूप से उनकी शिकायत
सेवानिवृत्त रक्षा अधिकारियों के बारे में है, जो उनके लेखन कौशल और जीवन के अनुभवों के बारे में अनुचित रूप से ऊंची राय रखते हैं।) के बारे में शिकायतें भी थीं। उनके हाथ में उनकी लिखी हुई कुछ पांडुलिपियां थीं। वे चाहते थे कि हम उन्हें पढ़ें। हमने जल्दी साफ कर दिया कि भले ही हम दोनों पत्रकार हैं, लेकिन हमारा कोई छिपा हुआ एजेंडा नहीं है। हमारी यह यात्रा विशुद्ध रूप से उनसे मिलने और उनकी दुनिया देखने तथा उनसे बातचीत करने के लिए है।

रस्किन का घर अप्रत्याशित रूप से सहज और आरामदायक था। जहां पहुंच कर काफी अच्छा लग रहा था। रस्किन के घर में ड्राइंग रूम के साथ एक छोटा सा बेडरूम था, जिसमें एक खिड़की थी, जो टिहरी रोड की तरफ खुलती थी। अजीबोगरीब लकड़ी के फर्श के साथ कमरे में कई पुरानी लकड़ी की बुकशेल्फ थी, जिनमें बेतरतीब सी किताबें भरी थीं।

ड्राइंग रूम के साथ एक दरवाज़ा उनके शयनकक्ष और अध्ययन कक्ष की ओर जाता था। उन्होंने बड़ी शालीनता से मुस्कराते हुए हमें दोनों जगहें दिखाईं। उन्होंने हमें अपनी किताबें, अपना सिंगल बेड (जो मुझे लगा कि उनके हिसाब से काफी छोटा था) कागजों और किताबों से लदी अपनी लेखन डेस्क और अपना पुराना टाइपराइटर भी दिखाया। उन्होंने बताया कि वे आज भी लेखन के लिए टाइपराइटर का प्रयोग ही
करते हैं, खासतौर पर जब वे कहानी लिख रहे हों। उन्होंने बताया कि कंप्यूटर का उपयोग उन्हें पंसद नहीं है। वे कभी उसका उपयोग नहीं करते।

बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि वे आजकल ज्यादा नहीं चलते, क्योंकि अब उन्हें गठिया की शिकायत है और उनका यूरिक एसिड भी बहुत बढ़ा हुआ है। मैंने जल्दी से कहा कि कहीं इसका कारण मटन कोफ्ता करी तो नहीं, क्योंकि मैं जानता था कि ये उनकी पंसदीदा डिश है। इस बात पर वे सहमति के साथ मुस्कराने लगे।

वे हमें अपने कमरे की एक खिड़की पर भी ले गए, जहां से उन्होंने हमें वही दृश्य देखने की इजाज़त दी, जिसे वे सालों से देख रहे थे। जब हमने मेपल वुड कॉटेज के दिनों के बारे में उनसे बातचीत की तो उन्होंने मुस्कराते हुए बताया कि छोटा बगीचा होने के बावजूद वह घर बहुत ठंडा था, जबकि यह घर बहुत गर्म है, क्योंकि इस घर पर सूरज की सीधी किरणें सबसे पहले पड़ती हैं।

हम पति पत्नी ने उनके साथ कुछ तस्वीरें लीं। हम दोनों इसमें काफी सीरियस लग रहे थे। मुझे लगता है, एक लेखक में यह बात होनी ही चाहिए। जब मैंने उन्हें उनके लेखन डेस्क पर बैठकर एक पोज़ देने के लिए कहा तो वे तुरंत सहमत हो गए । उन्होंने मुझे एक बेहतरीन और यादगार शॉट दिया। ये मेरे लिए कुछ ऐसा है, जिसे मैं जीवन भर संजो कर रखूंगा।

अभी हाल ही में जब मैं कुछ हफ्ते पहले मसूरी गया तो मुझे पता चला कि रस्किन अब मॉल में कैम्ब्रिज बुक स्टोर पर शनिवार को दोपहर के वक्त बुक साइनिंग सेशन में नहीं जाते। वे शायद इस सबके लिए बहुत बूढ़े हो चुके हैं। मैं समझ सकता हूं कि शनिवार की दोपहर को उन्हें शांति से आराम करना चाहिए, लेकिन मुझे आज भी लगता कि ‘एक अकेली लोमड़ी’ अपने पहाड़ी घर में नाच रही होगी और
अपने प्रशंसकों को अपने जादू से बांधने के लिए कोई नई कहानी सोच रही होगी।

बेशक, मैं उन भाग्यशाली लोगों में से हूं, जिनके पास उनके पहाड़ी घर की यादें हैं, जिसमें सबसे खास है, उनके पहाड़ी घर में, उनकी डेस्क पर ली हुई,  उनकी तस्वीर।

Leave a Reply

Your email address will not be published.