प्लास्टिक पेय पदार्थ स्ट्रा को अब बाय-बाय , आ गई सूखे नारियल के पत्तों से बनी इको फ्रेंडली स्ट्रा

इको फ्रेंडली स्ट्रा प्रोडक्ट को 100 फीसदी केमिकल फ्री प्रोसेस से बनाया जाता है

ज़िंदगीनामा न्यूज़ शख़्सियत सेहत

World Creativity and Innovation Day

प्रतिवर्ष 21 अप्रैल को संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व रचनात्मकता और नवाचार दिवस (World Creativity and Innovation Day) मनाया जाता है. वर्ल्‍ड क्रिएट‍िव‍िटी एंड एनोवेशन डे की स्थापना कनाडा की एक महिला मार्सी सेगल ने की थी. कोविड समय में लोगों ने लॉकडाउन में घर पर बैठ कर अपनी क्रिएट‍िव‍िटी का खुलकर उपयोग किया. लॉक डाउन के दौरान ही रणबीर-आलिया, रजनीकांत, अमिताभ, प्रियंका आदि फ़िल्मी सितारों ने फैमली – काला चश्मा खो गया शार्ट मूवी प्रस्तुत कर क्रिएट‍िव‍िटी दिखाई थी. यह फिल्म सभी कलाकारों ने अपने अपने घर पर रह कर स्क्रिप्ट के अनुसार शूट की थी.

बरहाल वर्ल्‍ड क्रिएट‍िव‍िटी एंड एनोवेशन डे पर हम बात करते हैं जमीन से जुड़े कुछ इनोवेशन Innovation की. क्राइस्ट यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु में अंग्रेजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर 54 वर्षीय साजी वर्गीज ने पेय पदार्थों में उपयोग के लिए पर्यावरण के अनुकूल स्ट्रॉ बनाकर प्लास्टिक के उपयोग का एक पर्याय प्रस्तुत किया. साजी वर्गीज की इस रचनात्मकता से तैयार हुए इको फ्रेंडली स्ट्रा प्रोडक्ट के उपयोग से कई गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है.

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साजी वर्गीज कहते है कि यूनिवर्सिटी परिसर में चारों ओर पड़े कई सूखे नारियल के पत्तों को देखकर, उन्हें इसके पेय पदार्थों में उपयोग के लिए पर्यावरण के अनुकूल स्ट्रॉ बनाने के लिए उनका उपयोग करने का विचार आया. हर साल एक नारियल का पेड़ स्वाभाविक रूप से अपनी छह पत्तियों तक खो देता है. इस विषय पर जब साजी वर्गीज ने अध्ययन किया तो उन्होंने पाया कि इन पत्तियों को नष्ट करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में जला दिया जाता है. जिससे पर्यावरण को नुकसान होता है.

साजी वर्गीज पर्यावरण के लिए प्रतिबद्ध, प्लास्टिक और अन्य पर्यावरण को हानिकारक उत्पादों के स्थायी विकल्प खोजने की दिशा में शोध कार्य करते हैं. उन्होंने बताया कि पेय पदार्थों में उपयोग की जाने वाली स्ट्रा,प्लास्टिक के पॉलीप्रोपाइलीन से बनाये जाते हैं. इसके विकल्प के लिए सूखे नारियल के पत्तों का एक अच्छा पर्याय मिला. डॉ. साजी वर्गीज बताते हैं कि इन इको फ्रेंडली स्ट्रा प्रोडक्ट को 100 फीसदी केमिकल फ्री प्रोसेस से बनाया जाता है.

सफाई और स्टीमिंग प्रक्रिया से सूखे नारियल की पत्ती के प्राकृतिक स्वस्थ मोम को सतह पर लाया जाता है,यह एंटीफंगल और हाइड्रोफोबिक हो जाता है और स्ट्रॉ के रूप में उपयोग करने के लिए आदर्श होता है. सूखे नारियल की पत्ती से बने स्ट्रॉ की शेल्फ लाइफ नौ महीने होती है. नारियल के एक पत्ते से दो सौ से अधिक बहु-परतीय स्ट्रॉ बनाए जा सकते हैं. भारत में उपलब्ध अपनी तरह के पहले अनुकूलन योग्य स्ट्रॉ की मांग के कारण कच्चे माल में कोई कमी नहीं हो सकती है. विभिन्न उपयोगकर्ता मांगों के लिए 3 मिमी से 13 मिमी व्यास की इको फ्रेंडली स्ट्रा प्रोडक्ट बनाये जाते हैं. डॉ. साजी वर्गीस का आविष्कार पर्यावरण के लिए बहुत योगदान देगा , यह भारत के ग्रामीण क्षेत्रों और अन्य नारियल उगाने वाले देशों में महिलाओं को रोजगार व आय के बड़े अवसर प्रदान करने सहायक होगा.

प्रोफेसर वर्गीस ने क्राइस्ट विश्वविद्यालय के अधिकारियों के सहयोग से इस स्ट्रॉ का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने, प्रौद्योगिकी विकसित करने के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त की. उनकी कंपनी ब्लेसिंग पाम्स प्राइवेट लिमिटेड, जो कि क्राइस्ट यूनिवर्सिटी में एक स्टार्ट-अप है, ने इन-हाउस पांच मशीनें विकसित करके उनका पेटेंट कराया. आज प्रोफेसर वर्गीस के इस इको फ्रेंडली स्ट्रा प्रोडक्ट की बहुत मांग है. उनके इको फ्रेंडली स्ट्रा प्रोडक्ट को भारतीय उद्यमिता विकास संस्थान (ईडीआईआई) से वर्ष 2020 में श्रेष्ठ उद्यमी गुरु पुरस्कार, एसोचैम, नई दिल्ली द्वारा स्टार्ट-अप लॉन्चपैड में प्रथम स्थान सहित कई पुरस्कार प्राप्त हुए हैं.

क्राइस्ट यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु के एसोसिएट प्रोफेसर साजी वर्गीज

साजी वर्गीज के इस उत्पाद व् उनको नीदरलैंड्स में क्लाइमेट लॉन्चपैड अवॉर्ड के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था और उन्होंने 45 प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले बेस्ट इनोवेशन फॉर सोशल इंपैक्ट का अवॉर्ड जीता था. इस उत्पाद ने कंपनी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और आज इसे मलेशिया, यूएसए, यूके, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और फिलीपींस जैसे देशों से ऑर्डर मिल रहे हैं. बाजार में इस उत्पाद को पेश करने के बाद से साजी वर्गीज की कंपनी को 10 से अधिक देशों से 20 मिलियन से अधिक स्ट्रॉ के ऑर्डर प्राप्त हुए हैं. सूखे नारियल के पत्तों से बनाए जा रहे इस केमिकल फ्री पर्यावरण के अनुकूल स्ट्रॉ के निर्माण के लिए मदुरै, तूतीकोरिन और कासरगोड में तीन केंद्र स्थापित किये जा चुके हैं.

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