कोविड के बढ़ते मामलों के बीच ऑफलाइन क्लासेस पर अभिभावकों की राय

कोविड के कम होते मामलों के बीच दिल्ली-एनसीआर के निवासी अभी राहत की ज़्यादा सांसें ले भी नहीं पाए थे कि कोविड का ख़तरा एक बार फिर से सिर उठाने लगा है। जहां फेसमास्क पर लगा प्रतिबंध फिर से जारी हो गया है, वहीं हाल ही में दोबारा खुले स्कूलों पर भी ख़तरे के बादल […]

न्यूज़ सेहत

कोविड के कम होते मामलों के बीच दिल्ली-एनसीआर के निवासी अभी राहत की ज़्यादा सांसें ले भी नहीं पाए थे कि कोविड का ख़तरा एक बार फिर से सिर उठाने लगा है। जहां फेसमास्क पर लगा प्रतिबंध फिर से जारी हो गया है, वहीं हाल ही में दोबारा खुले स्कूलों पर भी ख़तरे के बादल मंडराने लगे हैं। कोरोना के घटते मामलों को देखते हुए दिल्ली-एनसीआर में सभी स्कूलों को 1 अप्रैल, 2022 से सभी छात्रों के लिए खोल दिया गया था, लेकिन अब कोविड फिर से सिर उठाने लगा है तो बच्चों के साथ ही उनके अभिभावकों को भी यह चिंता सता रही है कि क्या एक बार फिर से ऑनलाइन क्लासेस की शरण में ही जाना पड़ेगा या ऑफलाइन क्लासेस ही सावधानी के साथ जारी रहनी चाहिए। इसी मामले की थोड़ी पड़ताल ‘सिटी स्पाइडी’ ने भी की, दिल्ली-एनसीआर के स्कूलों में पढ़ने वाले कुछ बच्चों के अभिभावकों से बातचीत के ज़रिये।

जहां एक ओर पिछले दिनों नोएडा के सेक्टर 40 स्थित खेतान स्कूल ने कोविड के 16 मामले (13 छात्र और 3 शिक्षक) पाए जाने के बाद सोमवार 11 अप्रैल को अपने स्कूल को बंद कर दिया। वहीं दूसरी ओर गाजियाबाद के एक प्राइवेट स्कूल में भी तीन बच्चों की कोरोना की रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। गौरतलब है कि दिल्ली में 13 अप्रैल, 2022 को कोविड के 299 मामले दर्ज किए गए, जो पिछले दिन की तुलना में करीब पचास प्रतिशत अधिक हैं। उसके बाद से भी इन संख्याओं के स्तर में कोई गिरावट दर्ज नहीं हुई है, बल्कि ये दिन पर दिन और बढ़ते जा रहे हैं।

कोविड के बढ़ते मामलों को देखते हुए अभिभावक बच्चों की सुरक्षा को लेकर जहां एक ओर काफी चिंतित दिखाई दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बच्चों की फिजिकल क्लासेस पर एक बार फिर सवाल उठने शुरू हो गए हैं।

उत्तरी दिल्ली के केशवपुरम की बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाली श्रेया गुप्ता के पिता पंकज गुप्ता कहते हैं, “ज्यादातर बच्चों के अभिभावक मई तक अपने बच्चों को स्कूल भेजने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन स्कूल खुलने के बाद उनके पास कोई विकल्प नहीं रहा। अगर माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते तो बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती। सबसे बड़ी समस्या यह है कि स्कूलों में कोविड मानकों का पालन गंभीरता के साथ नहीं हो रहा है और सरकार ने भी सभी प्रकार के प्रतिबंध हटाने में जल्दबाज़ी की थी। स्कूलों में सोशल डिस्टेसिंग की धज्जिया उड़ाई जा रही हैं। जब मैं एक बुक स्टोर पर किताब खरीदने गया तो मैंने देखा कि अभिभावक या स्कूल का कोई भी कर्मचारी सोशल डिस्टेसिंग का पालन नहीं कर रहा है। मैं सिर्फ कल्पना कर सकता हूं कि कक्षाओं में बच्चों की कैसी हालत होती होगी। यदि स्कूलों में पचास प्रतिशत बच्चों की अनुमति होती तो भी हम कुछ सुरक्षा की उम्मीद कर सकते थे, लेकिन अभी तो स्थिति काफ़ी निराशाजनक है।”

द्वारका के एक स्कूल में कक्षा 1 के एक छात्र के अभिभावक अनुरंजनी रंजन कहते हैं, “मैंने अपने बेटे को स्कूल छोड़ने के दौरान कई बार देखा है कि स्कूलों में कोविड प्रोटोकॉल का पालन ठीक ढंग से नहीं किया जा रहा है। मैंने अपने बच्चों को सैनेटाइज़र का उपयोग करना, साफ मास्क पहनना और सामाजिक दूरी का पालन करना सिखाया है, लेकिन जब बच्चे साथ आते हैं तो वे ऐसी चीजों को भूल जाते हैं, इसलिए शिक्षकों को जिम्मेदारी लेनी चाहिए कि वे छोटे बच्चों का खासतौर पर ध्यान रखेंगे। इसके अलावा बच्चों को वैकल्पिक दिनों में पचास प्रतिशत उपस्थिति के साथ बुलाया जाना चाहिए।”

उत्तरी दिल्ली के कमला नगर निवासी नितिन गुप्ता, जिनका बच्चा पांचवी कक्षा का छात्र है, कहते हैं कि वैसे तो बच्चे स्कूल जाने के लिए उत्साहित हैं, लेकिन स्कूल के अधिकारियों ने उचित व्यवस्था नहीं की है। स्कूलों में साफ-सफाई व कोविड संबंधी सुरक्षा मापदंडों की उचित व्यवस्था नहीं है। कक्षा में बच्चों को कीड़े और मच्छर मिलते हैं। शिक्षक सभी कोविड प्रोटोकॉल को बनाए रखने की पूरी कोशिश कर रहे होंगे, लेकिन पूर्ण उपस्थिति और खराब प्रबंधन के कारण मुझे लगता है कि वे बच्चों को संभालने में असमर्थ हैं। स्कूल बसों में भी कोई फिजिकल डिस्टेंसिंग मैंटेन नहीं की जा रही है।

मालवीय नगर निवासी हरमीत कौर, जिनका बच्चा चौथी क्लास में पढ़ता है, कहती हैं कि स्कूलों के दोबारा खुलने के बाद से बच्चे स्कूल जाने के लिए काफी उत्साहित हैं, लेकिन अभिभावकों के रूप में हम काफी चितिंत हैं, क्योंकि कोरोना का नया वेरिएंट एक बार फिर पैर पसार रहा है। स्कूलों को इस मामले में ज्यादा से ज्यादा एहितयात बरतने की जरूरत है।

यद्यपि कई बच्चों के अभिभावक मानते हैं कि स्कूलों का इन हालात में खुलना बच्चों के लिए खतरनाक हो सकता है, वहीं कुछ अभिभावक यह भी मानते हैं कि बड़ी कक्षाओं के बच्चों की फिजिकल क्लासेस कराना सुरक्षित हैं, क्योंकि वे सभी आवश्यक सावधानी बरतने में सक्षम हैं और अपनी सुरक्षा के प्रति स्वयं जागरूक हैं।

पूर्वी दिल्ली के गांधीनगर की दीपा वर्मा, जो बारहवीं की छात्रा हैं, उनकी मां जय वर्मा का मानना है कि सातवी कक्षा से ऊपर के बच्चे इस बात से अच्छी तरह से वाकिफ हैं कि वे अपनी सुरक्षा का ध्यान कैसे रखें, इसीलिए मैं अपने बच्चे की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हूं।

वैसे हम भी इस बात में विश्वसा करते हैं कि कोविड के बढ़ते मामलों के बीच इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस महामारी का ख़तरा अभी टला नहीं है। सो यह ज़रूरी हो जाता है कि आवश्यक सुरक्षा के मानकों का पालन पूरी तरह से किया जाना चाहिए। जहां बड़े बच्चे सैनेटाइज़र के इस्तेमाल, फेसमास्क पहने रहने के साथ ही सोशल डिस्टैंसिंग के प्रति भी जागरूर रहते हैं, वहीं छोटे बच्चों के मामले में यह ज़िम्मेदारी स्कूल प्रबंधन को ही उठानी पड़ेगी। ऐसे में अगर ऑफलाइन क्लालेस जारी रखने के निर्णय लिया जाता है तो ज़रूरी है कि स्कूलों के कोविड संबंधी सुरक्षा मानकों की भी कड़ी समीक्षा हो।

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