Janakpuri के इन बायो टॉयलेट का नहीं हो रहा इस्तेमाल, DDA को नहीं फिक्र

करीब सात वर्ष पूर्व जनकपुरी स्थित डिस्ट्रिक्ट पार्क में DDA (दिल्ली विकास प्राधिकरण) ने लोगों की सहूलियत के लिए जगह-जगह बायो टॉयलेट (Bio toilet)बनवाए थे, जो कि बनवाने जाने के बाद सात दिनों के भीतर ही अनुपयोगी साबित होने लगे।

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These bio toilets of Janakpuri are not being used, DDA is not worried

Delhi: करीब सात वर्ष पूर्व जनकपुरी स्थित डिस्ट्रिक्ट पार्क में DDA (दिल्ली विकास प्राधिकरण) ने लोगों की सहूलियत के लिए जगह-जगह बायो टॉयलेट (Bio toilet)बनवाए थे, जो कि बनवाने जाने के बाद सात दिनों के भीतर ही अनुपयोगी साबित होने लगे। नतीजा यह हुआ कि लोगों ने इसके इस्तेमाल से तौबा कर ली। अब जबकि पार्क में नए टॉयलेट बन चुके हैं, लेकिन जर्जर पड़े बायो टॉयलेट को डीडीए ने अभी तक पार्क से हटाना मुनासिब नहीं समझा है।

स्थानीय लोगों ने इस बात की शिकायत डीडीए उद्यान विभाग से की है। लोगों का कहना है कि जब ये अनुपयोगी हैं तो इन्हें आखिर हटाया क्यों नहीं जा रहा है।

जनकपुरी निवासी मलकीत सिंह बताते हैं कि बंद पड़े इन टॉयलेट से कई बार तेज बदबू निकलती है। बारिश के दौरान इसमें पानी भर जाता है। कई बार असमाजिक तत्व इसकी आड़ में छिप जाते हैं। बेहतर है कि पार्क में जगह-जगह पड़े छह बायो टॉयलेट्स को अब हटा दिया जाए।

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फिलहाल जब भी यहां सैर करने आने वाले लोग इन टॉयलेट्स के सामने से गुजरते हैं तो उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है और यह रोज़ की समस्या है।

जनकपुरी एक ब्लॉक निवासी दीपक का कहना है कि इन्हें जल्द से जल्द हटाया जाए। जनकपुरी सी 1 निवासी राकेश त्रेहन बताते हैं कि जनकपुरी व आस-पास स्थित पार्कों में लगे बायो टॉयलेट की वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो हर जगह इनका हाल बुरा है।

DDA ने भी कर ली तौबा

बायो टॉयलेट को सियाचिन जैसे उन इलाकों के लिए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की ओर से डिजाइन किया गया था, जहां कड़ाके की सर्दी पड़ती है। मूल उद्देश्य यह था कि बायो टॉयलेट के इस्तेमाल में पानी का इस्तेमाल कम से कम हो। टॉयलेट से इस्तेमाल के बाद निकलने वाले जैविक अवशेष के निष्पादन के लिए टायलेट के नीचे बनाए गए पिट में एक विशेष प्रकार के जीवाणु को छोड़ा जाता है, जो अवशेष को खत्म कर देता है। डीडीए इस जीवाणु को हैदराबाद स्थित डीआरडीओ से खरीदता था, लेकिन इस जीवाणु के काम करने की क्षमता अत्यधिक पानी के इस्तेमाल से प्रभावित होती है।

डीडीए के अनुसार हमारे यहां टॉयलेट में पानी अधिक इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति है। ऐसे में यहां जीवाणु भी पूरी क्षमता से कार्य नहीं कर पाते हैं।

यह पूछने पर कि बायो टॉयलेट लगाने से पहले डीडीए ने इन बातों पर ध्यान क्यों नहीं दिया, इस पर अधिकारी चुप्पी साध लेते हैं।

दिल्ली की परिस्थितियों को देखते हुए यह निर्णय लिया गया कि अब पार्कों में ऐसे नए बायो टॉयलेट नहीं बनाए जाएंगे। क्षेत्र के पार्कों में ऐसे करीब 39 बायो टॉयलेट हैं, जो अब अनुपयोगी हैं।

उद्यान विभाग से की जाएगी बात

डीडीए अभियंताओं का कहना है कि जब ये टॉयलेट लगाए गए थे, तब इसकी देख-रेख की जिम्मेदारी इंजीनियरिंग विभाग के पास थी, लेकिन अब यह मामला उद्यान विभाग के पास है। समस्या की बाबत उद्यान विभाग के अधिकारियों से बात की जाएगी।

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