क्या आप जानते हैं द्वारका के इन जल-दूत के बारे में?

जाने-माने पर्यावरणविद् दीवान सिंह को हाल ही में ‘जल प्रहरी सम्मान-2022’ से विभूषित किया गया है। यहां प्रस्तुत है, द्वारका में स्थानीय जल निकायों पर किए गए उनके कार्यों पर एक पूर्व-प्रकाशित समीक्षात्मक समाचार। जहां चाह वहां राह, द्वारकावासियों ने इस कहावत को सिद्ध करके दिखा दिया है। इन लोगों ने सेक्टर 23 के डीडए […]

शख़्सियत

जाने-माने पर्यावरणविद् दीवान सिंह को हाल ही में ‘जल प्रहरी सम्मान-2022’ से विभूषित किया गया है। यहां प्रस्तुत है, द्वारका में स्थानीय जल निकायों पर किए गए उनके कार्यों पर एक पूर्व-प्रकाशित समीक्षात्मक समाचार।

जहां चाह वहां राह, द्वारकावासियों ने इस कहावत को सिद्ध करके दिखा दिया है। इन लोगों ने सेक्टर 23 के डीडए पार्क स्थित एक सूखे हुए जल निकाय को पूरी तरह से पुनर्जीवित कर दिया है। इन लोगों के संयुक्त प्रयास से जिस जल निकाय में पानी की एक बूंद भी नहीं थी, वह अब साल भर पानी से भरा रहता है।

सिटीस्पाइडी ने जब इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लोगों से बात की तो उन्होंने बताया कि इसकी शुरुआत साल 2010 में तब हुई थी, जब शमन अपार्टमेंट्स के पर्यावरण प्रेमी दीवान सिंह ने क्षेत्र के जल निकायों के बारे में कार्य करने के बारे में सोचा। गौरतलब है कि दीवान सिंह एक जाने-माने पर्यावरणविद् हैं और उन्हें इन कार्यों के लिए कई बार बड़े स्तर पर सम्मानित और पुरस्कृत भी किया जा चुका है।

जब दीवान सिंह ने लोगों से इस बात को साझा किया तो लोगों ने भी उनकी इस सामाजिक चिंता के प्रति गहरी रुचि ज़ाहिर की और फिर 2011 में लोगों की सक्रिय भागीदारी के बाद धीरे-धीरे इस कार्य ने एक आंदोलन का रूप ले लिया।

आरडब्ल्यूए, सामाजिक संगठन, अन्य निवासी समूह, ग्रामीणों आदि ने सामूहिक रूप से इस पर काम किया। इसी श्रृंखला में अनेक लोगों ने श्रमदान किया। नगर निकायों के साथ जगह-जगह बैठकें कीं और मिट्टी व उसमें जल पुनर्भरण की क्षमता के लिए अलग-अलग विशेषज्ञों की टीम को बुलाया गया। इतना ही नहीं ‘वॉटरमैन’ के नाम से मशहूर राजेंद्र सिंह को भी इस अभियान को मजबूती प्रदान के लिए आमंत्रित किया गया।

सभी लोगों का यह अथक प्रयास आज शहर की सफलता की कहानी बन गया है।

इस अभियान में हुई घटनाओं के बारे में बात करते हुए द्वारका के स्थानीय लोगों ने बताया कि सबसे पहले 6 जून, 2013 को दिल्ली के तत्कालीन उपराज्यपाल ने द्वारका जल निकाय समिति का गठन किया। इस चार सदस्यीय पैनल में दीवान सिंह, वरिठ नागरिक समूह सुख-दुख के साथ एसएस मान, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शशांक शेखर और उप शहर के मुख्य अभियंता शामिल थे।

एसएस मान का इस बारे में कहना था, “हालांकि सरकारी अधिकारियों की इस काम में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। फिर भी व्यक्तिगत स्तर पर हम द्वारका में 33 से अधिक जल निकायों की खोज करने में कामयाब रहे और हमने उनके पुनरुद्वार के लिए अपने स्तर पर कार्य शुरू कर दिया।

दीवान सिंह ने बताया कि हमने जल निकायों के पुनरुद्धार और संरक्षण के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल से संपर्क किया। नंवबर 2016 में ट्रिब्यूनल द्वारा इस विषय पर उत्साहजनक आदेश भी पारित किया गया, लेकिन दुर्भाग्य से डीडीए द्वारा इस आदेश पर कोई विचार नहीं किया गया।

अंततः सब कुछ एक बार फिर से स्थानीय निवासियों के ज़िम्मे ही छोड़ दिया। हालांकि लोगों ने इसे भाग्य-भरोसे छोड़ने की जगह अथक प्रयास किए और इस क्षेत्र के जलाशयों को पुनर्जीवित करने को एक चुनौती की तरह स्वीकारा।

इन लोगों ने बताया कि वर्ष 2011-12 से पोचनपुर गांव एवं द्वारका सेक्टर 22, 23 के निवासी और कुछ सामाजिक संगठन मुख्य रूप से इन स्थानीय जल निकायों के पुनरुद्धार की दिशा में सक्रिय हैं। हालांकि उनके लिए भी यह कोई आसान काम नहीं था। उस पर से अधिकारियों का सहयोग पहले भी कुछ ज़्यादा नहीं मिल रहा था। यही वजह है कि इन स्थानीय जल निकायों में अगर आज पानी देखने को मिल रहा है तो इस सफलता का श्रेय सिर्फ़ द्वारका के इन स्थानीय लोगों को ही जाता है।

सुख दुख के साथी और जलाशिखर जैसे वरिष्ठ नागरिक-समूहों की इस अभियान को सफल बनाने में एक अहम भूमिका रही। एसएस मान ने कहा कि यह अभियान सामूहिक प्रयास का एक आदर्श उदाहरण रहा है। जिन स्थानों को वर्षों से उपयोग में नहीं लिया गया था, उन स्थानों पर लोगों ने कई जोखिमों का सामना भी किया था। ऐसे कई स्थानों पर कीड़े-मकौड़ों और सांप-बिच्छू आदि का भय था, इसलिए यह एक कठिन कार्य था, लेकिन यदि अब हम इसे देखें तो गर्व और संतुष्टि होती है कि गहराते जल-संकट के बीच हमने इस चिंता को सिर्फ़ समझा ही नहीं, बल्कि इस दिशा में अपने स्तर पर कुछ करके भी दिखाया।

जब सिटी स्पाइडी द्वारका के इन स्थानीय जल-दूतों से इस बारे में जानना चाहा कि इन जलाशयों के पुनरुद्धार के बाद उन्होंने क्या बदलाव महसूस किया तो उनका कहना था कि इन जलाशयों के चारों ओर अब एक छोटा-मोटा जंगल ही उग गया है। हर मौसम में यह क्षेत्र हरियाली से घिरा रहता है। पूरी दुनिया आज जिस तरह से प्रदूषण और जल संकट का सामना कर रही है, उसे देखते हुए इस उपलब्धि को कमतर नहीं आंका जा सकता। स्थानीय स्तर पर बन गए इस छोटे से जंगल में नील गाय, मोर और कई प्रकार के पक्षियों की प्रजातियों में वृद्धि हुई है। दिल्ली की आबोहवा में यह जगह बेहद राहत देती महसूस होती है।

दीवान सिंह ने यह भी बताया कि इन जल निकायों के आसपास प्री और पोस्ट मानसून का स्तर काफी अच्छा रहा है। 2015 में जहां जल के स्तर में 8 फीट की वृद्धि हुई, वहीं 2017 में इसमें 2 फीट की और वृद्धि दर्ज की गई। भूजल की गुणवत्ता में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। भूजल में टीडीएस की मात्रा में 50 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। उन्होंने कहा कि हम अपने पिछले प्रयोगों से अधिकारियों को अवगत कराने का प्रयास कर रहे हैं कि स्थानीय स्तर पर किए जाने के बावजूद हमारी कोशिशों से क्या कुछ बदल गया है और अभी क्या-क्या संभावनाएं हैं। इस साल हम पानी के पुनरुद्धार के लिए बारिश के पानी की एक-एक बूंद का उपयोग करना चाहते हैं।

यह ठीक है कि अपने परिवेश और पर्यावरण को बचाने के लिए हम हमेशा सिर्फ़ सरकारी सहायता का मुंह नहीं जोह सकते। हम सभी को अपने स्तर पर भी काफ़ी काम करने की ज़रूरत है। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर हम अपनी छोटी से छोटी कोशिश को भी हल्के में नहीं ले सकते। इसी के साथ इस बात का भी उतना ही बड़ा महत्व है कि सरकारी स्तर पर लोगों के इस प्रयास को कितना सकारात्मक योगदान मिलता है, क्योंकि कुछ बातें सरकारी सहयोग से ही संभव हो पाती हैं।

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